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कही-अनकही 16 : बेचारगी मोड

अनन्या मिश्रा
शादी के पहले आदि एना को समझा रहा था...
 
‘बस एना, तुम आ जाओ मेरे पास और फिर तुम सबका ध्यान रख लेना, मैं तुम्हारा रख लूंगा । हम दोनों आराम से प्यार से पूरी ज़िंदगी साथ रहेंगे। सोचो, साथ रहेंगे तो कितनी आसान लाइफ हो जाएगी?’
 
शादी होने के बाद वैसे तो एना सारा काम सीख ही गई थी । उसे ‘सुधारने’ और ‘सिखाने’ के लिए हमेशा ‘अपने’ लोग तैयार रहते थे। वही लोग जो चाहते थे की बहू ‘परफेक्ट’ होनी चाहिए। चाहे ठंड हो या गर्मी, थोड़ी थकान हो या सिरदर्द, या ‘पीरियड्स’ हों या बुखार, वह सुबह उठ कर खाना बनाती। साफ़-सफाई करती। टिफिन तैयार करती। नहाती। ब्रेकफास्ट तैयार कर टेबल पर रखती और आदि को जगाती ताकि वह समय पर बस स्टॉप पर एना को छोड़ दे।
 
कुछ समय से एना बीमार थी और इस बात को नज़रंदाज़ कर रही थी, क्योंकि अगर वह कहेगी की वह बीमार महसूस कर रही है तो लोग उसे 100 ताने देंगे। 
 
‘मायके में तो कुछ काम किया नहीं, अब करना पड़ा तो बीमार हो गई।’
 
‘थोड़ा तो एडजस्ट करना ही पड़ता है लड़कियों को। और तुम तो हेल्दी हो, क्या कमजोरी?’
 
‘हमारे घर की लड़कियां तो ऐसे नौटंकी नहीं करती, इसे ही पता नहीं क्यों कमजोरी हो जाती है’
 
‘काम न करने के सौ बहाने हैं। पता नहीं आदि को ठीक से खिलाती-पिलाती भी है या नहीं।’
 
तबियत ज्यादा बिगड़ी और एना को ब्लड टेस्ट कराना पड़ा। डॉक्टर ने 8 ब्लड टेस्ट लिखे – सारे खाली पेट, एक साथ। यानि 8 ट्यूब भर के खून। शनिवार को कराना तय हुआ क्योंकि डॉक्टर ने कहा की सोमवार तक रिपोर्ट आ जाएगी तो ट्रीटमेंट शुरू कर देंगे। आदि ने एहसान किया और अपने ‘बेहद व्यस्त’ ऑफिस के समय से 1 घंटा एना के ब्लड टेस्ट के लिए निकाला। 8 ट्यूब खून निकलने से एना को चक्कर आने लगे। डॉक्टर ने वहीं लेटने को कहा और फ्रूटी पिलाई। आदि बार-बार घड़ी देख रहा था क्योंकि उसे ऑफिस जाना था। लेकिन डॉक्टर ने उसे कहा कि एना के लिए जूस ला दे। एना का जी भी घबराने लगा था और अंधेरा छा रहा था। आदि चीकू शेक ले कर आया। एना धीरे-धीरे पी रही थी तो चिढ़ गया - ‘जल्दी पियो तुम ऑफिस जाना है मुझे।’
 
घर आने पर एना को बुखार सा आ गया। चक्कर आने लगे। अंधेरा छाने लगा। आदि लेकिन ऑफिस चला गया। 
 
शाम को एना ने सिर्फ खिचड़ी बनाई। थोड़ी साफ़-सफाई कर दी। कमजोरी थी इसलिए परेशान थी। उसे रोना आने लगा क्योंकि वह घर पर अकेली थी। रोते हुए उसने आदि को फ़ोन किया। आदि का फ़ोन व्यस्त था। थोड़ी देर बाद उसने फ़ोन किया।
 
‘आदि प्लीज जल्दी आ जाओ। मुझे ठीक नहीं लग रहा है।’
 
‘देर लगेगी एना। क्या हुआ है तुमको?’
 
‘तबियत ठीक नहीं है। चक्कर आ रहे हैं। अकेली हूं, डर लग रहा है। प्लीज आ जाओ।’
 
‘आता हूं काम निपटा कर। खाना हो गया?’
 
‘मैं ज्यादा कुछ नहीं कर पाई। सो रही थी दिन में। सिर्फ खिचड़ी बना पाई हूं। तुम दही ले आना। सफाई भी नहीं हो पाई है। बाद में कर दूंगी। तुम आ जाओ बस । ठीक नहीं हूं मैं तो भी नहीं आ पाओगे क्या?’
 
‘ बोला ना देर लगेगी। और ये क्या नाटक है? हमेशा बेचारगी मोड में क्यों रहती हो तुम... कि कमजोरी है, घर आ जाओ, वगैरह? खाती-पीती तो मेरे जितना ही हो तुम। किस बात की बेचारगी है तुमको? ये नौटंकी वाले बेचारगी मोड से बाहर निकलो और खुद का ध्यान खुद रखना सीखो तुम। कुछ करने की ज़रूरत नहीं है मेरे लिए। खुद को संभाल लो वही बहुत है।’
 
एना सोचती रही- ‘बस एना, तुम आ जाओ मेरे पास और फिर तुम सबका ध्यान रख लेना, मैं तुम्हारा रख लूंगा । हम दोनों आराम से प्यार से पूरी ज़िंदगी साथ रहेंगे। सोचो, साथ रहेंगे तो कितनी आसान लाइफ हो जाएगी?’

आज वही आदि उसके 'बेचारगी मोड' से कितना ज्यादा परेशान है न... 'बेचारा आदि'! लेकिन एना के कष्ट का क्या? ये तो सभी ‘कही-अनकही’ बातें हैं, लेकिन क्या तकलीफ और बीमारियां इंसान को ‘बेचारा’ बना देती हैं? क्या कोई बीमार है तो उसकी मदद करने से घरवालों का समय नष्ट होता है? आपके क्या विचार हैं?

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