sawan somwar

कही-अनकही 4 : पासवर्ड

Updated: बुधवार, 7 जुलाई 2021 (15:23 IST)
'हमें लगता है समय बदल गया, लोग बदल गए, समाज परिपक्व हो चुका। हालांकि आज भी कई महिलाएं हैं जो किसी न किसी प्रकार की यंत्रणा सह रही हैं, और चुप हैं। किसी न किसी प्रकार से उनपर कोई न कोई अत्याचार हो रहा है चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या आर्थिक, जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, क्योंकि शायद वह इतना 'आम' है कि उसके दर्द की कोई 'ख़ास' बात ही नहीं। प्रस्तुत है एक ऐसी ही 'कही-अनकही' सत्य घटनाओं की एक श्रृंखला। मेरा एक छोटा सा प्रयास, उन्हीं महिलाओं की आवाज़ बनने का, जो कभी स्वयं अपनी आवाज़ न उठा पाईं।'
पासवर्ड
 
‘आ गए, आदि?’
 
‘हां... खाना लगा लो एना... घर पर बात हुई थी क्या तुम्हारी?’
 
‘हां, रोज़ ही करती हूं मैं ऑफिस से आने के बाद दोनों घर पर... मेरे भी और तुम्हारे भी... क्यों?’
 
‘मेरी घर पर बात हुए ही पंद्रह दिन हो चुके... लगाता हूं...’
 
‘चलो, खाना लग गया... अरे? ये क्या है… रोज़ आ कर मेरा फ़ोन चेक करने का नया शौक है क्या?’
 
‘हां... पानी ला दो...’
 
‘क्या करोगे सारे मैसेज पढ़ के? एक-एक चैट पढ़ते हो बैठ के रोज़ मेरी...’
 
‘हां... अच्छा लगता है मुझे पढ़ना कि तुम किससे क्या बात कर रही हो...’
 
खाने के बाद...
‘आदि! तुम्हारा फ़ोन आ रहा है... मैसेज भी हैं...’
 
‘रख दो, मैं वॉशरूम से बाहर आ कर देखता हूं...’
 
‘मैं देखती...  किसका है...’
 
‘एना! ये क्या कर रही हो तुम? रख दो मेरा फ़ोन... हाथ भी मत लगाना...’
 
‘अरे? देख रही हूं किसका फ़ोन या मैसेज था... खुद मेरा फ़ोन चेक करते हो, मैसेज चेक करते हो... यहां तक मैं अपने घरवालों से क्या बात करती हूं, ये तक हर रोज़ चेक करते हो...’
 
‘तो?’
 
‘तो? उस दिन जब मैं बीमार थी, तो तुमने मेरे फ़ोन से मेरी ही दोस्त को मैसेज कर दिया था और घर बुलाया था, ताकि तुम्हारी ऑफिस की छुट्टी न लग जाए... लेकिन मैं तुम्हारा फ़ोन उठा भी नहीं सकती?’
 
‘नहीं... और तुम्हारे बस की भी नहीं है... तुम बड़े लोग हो आई-फ़ोन वाले... तुम लोगों को एंड्राइड सिस्टम कैसे समझ आएगा? छूना मत मेरा फ़ोन आज के बाद...’
 
‘रियली? आईओएस बाद में आया, उसके पहले एंड्राइड ही था मेरे पास... खैर!’
 
अगले दिन...
 
‘एना! ये क्या है... तुम्हारे फ़ोन का पासवर्ड किसने बदला?’
 
‘मैंने ही...’
 
‘क्यों?’
 
‘तुम्हें क्या करना फ़ोन चेक कर के जब मैं तुम्हारा फ़ोन तक देख नहीं सकती...’
 
‘तुमको काम ही क्या है मेरे फ़ोन पर? बहस मत करो फालतू... पासवर्ड बताओ...’
 
‘नहीं...अपना बताओ पहले...’
 
‘रहने दो... ठीक है फिर... लो पकड़ो अपना फ़ोन, एना! फालतू की नौटंकी के लिए वक़्त नहीं मेरे पास!’
 
आदि अपना फ़ोन झपट कर, एना को धक्का मार कर दूसरे कमरे में चला गया, और एक बार फिर एना ‘कही-अनकही’ बातों के चक्कर में मन मसोस कर रह गयी... आप क्या करते?
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लेखक के बारे में
अनन्या मिश्रा
सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन्स, आईआईएम इंदौर.... और पढ़ें

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