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मार्मिक कहानी : रिंगटोन

Updated: शुक्रवार, 1 जुलाई 2016 (13:10 IST)
समीर पुणे मे प्रबंधन की पढ़ाई कर रहा था। तब हमारे यहां टेलीफोन नहीं था। मोबाइल फोन भी किसी किसी के पास ही होता था। ले दे कर सार्वजनिक टेलीफोन बूथ पर एसटीडी सुविधा होती थी। फिर जब घर बदला तो पड़ोसी के यहां जरूर टेलीफोन कनेक्शन था। शर्माजी भले आदमी थे, समीर को उनका टेलीफोन नंबर दे रखा था। अक्सर वह रविवार को शर्माजी के यहां फोन लगाकर हमसे बातचीत कर लिया करता था।

जब भी रविवार आता मां सुबह से ही समीर के फोन का इंतजार करने लगती। हम उनकी इस अधीरता का मजा लिया करते। वह कहती- 'हां इंतजार तो रहता ही है, मूल से प्यारा जो होता है ब्याज।'
 
शर्माजी के घर में रविवार को सुबह जब टेलीफोन की घंटी बजती थी, तो पत्नी रसोई में गैस पर रखे कुकर को नीचे उतार लेती थी, मां के कान चौकन्ने हो जाते थे। हम सब शर्माजी की आवाज का बेसब्री से इंतजार करने लगते, थोड़ी देर ही में वहां से कोई कहता - 'फोन आया है पूना से, बात कर लीजिए।'
 
मां सबसे पहले दौड़ पड़ती थी, पोते के हालचाल जानने के लिए। वह रविवार मुझे अब तक याद है जब मां की बैचेनी मुझ से देखी न गई थी। शर्माजी किसी शादी में गए हुए थे, उनके घर के दरवाजे पर ताला पड़ा हुआ था, अंदर टेलीफोन की घंटी घनघना रही थी। बंद दरवाजों के पीछे से समीर जैसे बहुत देर तक पुकारता रहा था हमें।
 
फिर एकाएक समय बहुत तेजी से बदल गया। देश में संचार क्रांति हो गई। मोबाइल फोन तो जैसे शरीर का हिस्सा हो गए। बैंक की नौकरी के चलते हर तीसरे साल तबादला हो जाता था। मां भी नए शहर और नए घर में हमारे साथ ही होती थी। कोर्स पूरा होते ही समीर का भी कैंपस सिलेवक्शन हो गया। अब वह नौकरी के कारण दिल्ली पहुंच गया था। उसके पास अपना मोबाइल था, जब चाहता हमसे बात कर लिया करता। लेकिन बात करने में अब वह बात नहीं रही जो शर्माजी के लैंडलाइन फोन में होती थी।
 
हर तीन साल में बैंक से मुझे नया हेंडसेट मिलता था। पुराने हेंडसेट पत्नी बेटी को हस्तांतरित होते गए। बाद में एक और नया हेंडसेट मिला, कुछ दिनों तक तो वैसे ही पड़ा रहा फिर नई सिम डलवाकर मां को दे दिया। बेटी ने मां के बहुत से परिचितों, रिश्तेदारों के नंबर उनके सेट मे सेव कर दिए तथा डाइलिंग के लिए सरलीकृत व्यवस्था कर दी। एक नंबर दबाने पर मामाजी का, दो पर मेरा, तीन से समीर का, चार से बुआजी का नंबर आसानी से डायल हो जाता था। अपना फोन मिल जाने से मां में विशेष आत्मविश्वास दिखाई देने लगा। अपने फोन को वह बड़े जतन से संभाल कर रखतीं। अपने हाथों से उन्होंने फोन का एक कवर भी बनाया। मिलने-जुलने वालों को वे बड़े गर्व से बतातीं, कि अब उनके पास भी अपना मोबाइल फोन है, वे उन्हें सीधे फोन लगा सकते हैं। शुरु-शुरु मे तो मां को बहुत फोन आए। वह भी अपने मोबाइल से भाइयों, देवरानी आदि से बातें कर लिया करतीं। हालचाल जानने के साथ-साथ उनका समय भी कट जाता, मन बहल जाता और उसके बाद स्मृतियों के संसार मे वे घंटों खोई रहतीं। महीने दो महिनों तक ही चल सका यह सिलसिला। फिर कम हो गए मां को फोन आना। मां का मोबाइल ज्यादातर खामोश रहने लगा।
 
पिताजी की तस्वीर के पास अक्सर मां का चश्मा और मोबाइल रखा होता था। कभी रिंगटोन बजती तो मां फोन कान से लगाती हुई गुड़हल के पेड़ के समीप आकर सुनने लगती। बहुत देर तक फोन चलता रहता। बात समाप्त होने पर मोबाइल पिताजी की तस्वीर के पास रखकर फिर अपने कामकाज में जुट जाती।
 
बहुत दिनों तक तो हम यही समझते रहे कि समीर मां को फोन करता होगा, लेकिन फोन सुनने के बाद उनके चेहरे के भावों से ऐसा नहीं लगता था कि पोते से बात हुई है। मैं उनसे पूछता कि किससे बात हुई है, तो वे अक्सर टाल जातीं, बताती नहीं कि किसका फोन था। पत्नी-बेटी ने भी पूछकर देख लिया, लेकिन सफलता नहीं मिली। अब हमारे लिए यह जिज्ञासा नहीं रही बल्कि मां को आनेवाला फोन कॉल हमारे लिए चिंता की बात हो गई थी। बुजुर्गों को ठगने लूटने की घटनाएं आम हो गर्ईं हैं, हमारी परेशानी स्वाभाविक थी। कहीं कोई बदमाश मां  को परेशान तो नहीं कर रहा, इसलिए थोड़ा गुस्सा जताते हुए मैंने जब इस बारे में जोर देकर पूछा तो मां ने चिढ़कर कहा- 'रतन टाटा का फोन आता है मेरे पास,बोल क्या कहना है।'
 
मां के इस तरह चिढ़ जाने से मैं चुप हो गया और घूमने के लिए घर से बाहर निकल गया। उस दिन बात यहीं समाप्त हो गई।
 
मां के मोबाइल पर कभी दो बार फोन आता फिर दिन मे एकबार ही आने लगा। हां, मेसेजेस तो बहुत आते थे, जिन्हें बेटी डिलिट कर दिया करती थी। हर दिन आनेवाले फोन को मां हमेशा सुनती। फोन सुनकर फिर पिताजी के चित्र के पास रख देती। भागवत कथा आदि में जब जातीं तो अपना मोबाइल ले जाना नहीं भूलतीं। हम लोगों ने भी कह रखा था कि अपना मोबाइल सदैव पास रखें ताकि जरूरत पड़ने पर हमसे संपर्क हो सके।
 
उस दिन वे अपना मोबाइल वहीं पिताजी की तस्वीर के पास ही भूलकर पड़ोस में हो रहे भजन-कीर्तन में चली गर्ईं थीं। मैं बैंक से लौटा ही था। नब्वे साल पुराने हमारे बैंक का बड़े बैंक में विलय हो गया था, इसलिए मन में खिन्नता और उदासी थी। अखबार सामने फैला रखा था लेकिन दिमाग कहीं और लगा था। तभी मां के मोबाइल की रिंगटोन गूंज उठी- 'भूल न जाना तुम से कहूं तो- - -।' मां को फोन तो दे दिया था लेकिन रिंगटोन वही पुरानी बजती थी। पत्नी ने कई बार कहा था कि इसे बदलकर कोई भजन या आरती की टोन डाल दूं लेकिन मैं अब तक यह नहीं कर पाया था। मैंने मां का मोबाइल फोन उठाया, कान से लगाया, देखें मां के रतन टाटा क्या कह रहे हैं। सामने से आवाज आ रही थी -' इस गाने को रिंगटोन बनाने के लिए कृपया एक दबाएं, मैंने एक गाना सुना फिर दूसरा सुना,--कुल आठ लोकप्रिय गीतों के मुखड़े रतन टाटा ने सुनाए। मां के मित्र ने मेरी उदासी भी कुछ देर के लिए दूर कर दी थी।
लेखक के बारे में
ब्रजेश कानूनगो
ब्रजेश कानूनगो जानेमाने कवि-साहित्यकार-व्यंग्यकार हैं। समाजसेवा से जुड़े हैं।.... और पढ़ें
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