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लघु कहानी : संगति

Updated: गुरुवार, 7 दिसंबर 2017 (14:17 IST)
संगति का असर तो होता ही है। यह बात रमेश को उस समय समझ आई, जब 1 माह तक अपनी बुरी आदतों को छोड़कर वह सादगी से अपने कर्म में जुटा रहा। उसके व्यवहार परिवर्तन के बाद ही रमेश के 'गुरुजी' आज घर आ रहे थे। वह उनके आगमन से उत्साहित और प्रसन्न था। साथ ही उसे यह पछतावा भी हो रहा था कि काश! पहले ही उसे सच्चा मार्गदर्शन क्यों नहीं मिला। क्यों उसने अपने परिजनों की समझाइश पर ध्यान नहीं दिया? 
 
पर कहते हैं ना कि 'जब जागे तभी सवेरा'। यही सवेरा अब रमेश की बर्बाद होती जिंदगी में खुशहाली लेकर आया था। उसे याद आ रहा था कि कैसे अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए वह गलत संगत का शिकार हुआ और शराब-शबाब को अंगीकार कर अपने हंसते-खेलते परिवार से धीरे-धीरे दूर होता चला गया। 
 
सुबह से रात तक सिगरेट-शराब के आदी हो चुके रमेश को कई बार सबने समझाया, पर उस पर कोई असर नहीं हुआ। लेकिन जब व्यवसाय बैठ गया तो उसके एक मित्र ने उसे एक सिद्धपुरुष से मिलवाया। 
 
कुछ सोचकर महात्मन् ने रमेश से कहा- 'सब ठीक हो जाएगा, पर इसके लिए तेरे घर में एक अनुष्ठान करना होगा।'
 
अपनी अनेक परेशानियों से घिरे निराश रमेश ने इस हेतु सहर्ष स्वीकृति दे दी लेकिन गुरुजी ने घर में प्रवेश करने से इंकार कर दिया। 
 
रमेश ने जब कारण जानना चाहा तो अपने नेत्र बंद कर वे बोले- 'तेरे घर से शराब की बू आ रही है। ऐसे में मातारानी का अनुष्ठान नहीं हो सकता। तुझे सिगरेट और शराब छोड़ना होगी। यदि ऐसा कर सका तो 1 माह बाद अनुष्ठान हो सकेगा जिससे तेरी सारी परेशानी दूर हो जाएगी और व्यवसाय फिर चल पड़ेगा। साथ ही परिवार में भी सुख-शांति आ जाएगी।'
 
गुरुजी की बात सुनकर रमेश पसोपेश में पड़ गया लेकिन तुरंत ही स्वयं को संभालते हुए उसने गुरुजी को वचन दे दिया- 'अभी से ही वह सिगरेट और शराब को हाथ नहीं लगाएगा और उसने यह कर दिखाया।' 
 
आज 1 माह हो गया था। गुरुजी अनुष्ठान के लिए घर आ रहे थे। परिवार के सभी सदस्य खुशी-खुशी अनुष्ठान और गुरुजी के स्वागत की तैयारी में जुटे थे। अनुष्ठान पूरा हुआ और कुछ ही दिनों में सार्थक परिणाम भी दिखने लगे।
 
रमेश ने दोनों प्रकार की संगत का असर देख लिया था। वह समझ गया था- अच्छी और बुरी संगत के परिणामों को!
लेखक के बारे में
देवेन्द्र सोनी

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