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हिन्दी कविता : ईश्वर की अद्भुत कृति 'नर्स'

Updated: मंगलवार, 2 जून 2020 (12:17 IST)
-जनार्दन शर्मा
 
वर्षों से देखा सबने, सुंदर सफेद परिधानों से सज्जित,
सदा अपने अधरों पर लिए, मधुर मुस्कान, वो तरुणाई।
 
सदा सेवा में तत्पर रहती, जो किसी ने आवाज लगाई,
सिस्टर कहा किसी ने, तो किसी ने नर्स, कोई कहता नर्स बाई,
 
वात्सल्य, सेवा, त्याग की, मूरत, सदा करती हैं सबकी भलाई।
जो रक्त देख के रहे निडर, जन्म-मृत्यु देख न कभी हो घबराई।
 
मां सी ममता उड़ेल, जन्म से रोते बच्चों की बन जाती आई।
मन में प्रेम, कोमलता, दया के भाव लिए सदा ही वो मुस्कुराई।
 
प्रेम दिया किसी ने तो किसी ने उसका अपमान भी किया।
अपनी सेवा में कोई कमी न रख, हर मरीज को ठीक किया।
 
हर मरीज के मर्ज से रिश्ता जोड़, वो मीठे से सुइयां चुभाती है।
कभी प्यार से तो कभी डांट के, वो कड़वी दवा भी खिलाती है।
 
जिसका दिल है दयावान, सेवा भाव से सदा सेवा करती आई है,
अपने दर्द को दिल में छुपा, मरीजों को देख सदा मुसकाई है।
 
सदियों से संक्रमण के हर दौर में, खड़ी सदा करती अगुवाई है।
दूसरों की सेवा करते-करते कुछ ने, खुद की भी जान गंवाई है। 
 
नमन करता हैं 'जनार्दन' तुम्हें सदा, ईश्वर ने भी 'नर्स' के रूप में,
सेवा, सुश्रुसा का भाव जगा, अपनी एक अद्भुत कृति बनाई है।
 

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