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मार्मिक कविता : ओ मेरी उदास अहिल्याओं

Updated: शनिवार, 3 अक्टूबर 2020 (20:09 IST)
अपने तप बल से 
उठना है तुम्हें 
अत्याचार तिरस्कार 
नफरतों की खाइयों 
दरिंदगी के नर्क से 
न सहना जुल्म 
वीरांगनी 
करना न कभी सितम 
अब न खामोश रहना
तुम्हें ज्वाला है बनना
 
धधकना ऐसे कि 
फूंक जाएं कलेजे
ध्वस्त हों अंधेरे 
ओजस्वनी
तुम्हारे मत्थे सजे 
रूपहले सूरज चांद तारे 
शक्ति हो तुम हो प्रकृति 
ओजस्वनी 
बुध्दि वैभव अपार 
हैं सृजन कर्म महान
तुमसे ही संस्कृति की पहचान 
 
न करना तुम लंबी उदास 
मातमी उपेक्षित प्रतीक्षा 
प्रण कर साथ बढ़ना
लादना नहीं कफन 
उतर न जाना किसी खोह में 
न बनना पत्थर 
न हो गुमनामी जीवन 
वंदिते 
करो जागरूक 
जन हो आक्रोशित 
एक धर्म हो अब इंसानियत 
 
जीवन को ग्लानि न करना 
देना आसरा उनको भी 
जो बीच राह भूल गए 
खुशियों को उधार रख जीना
नेक राह पर चलकर 
लक्ष्य अपने पर अडिग रहकर 
तपस्विनी
बाधाओं से ना डरना 
करना तुम रौशनी जमा 
मुट्ठी में हो सितारों भरा आसमां
ओ मेरी उदास अहिल्याओं। 

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लेखक के बारे में
अमर खनूजा चड्ढा
स्वतंत्र लेखिका.... और पढ़ें

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