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फिर-फिर जिंदा होता रावण...

Updated: शनिवार, 30 सितम्बर 2017 (14:57 IST)
हम जलाते रहते हैं हर बार रावण,
आरोपित करके उसमें सब बुराइयां।
और देख लेते हैं उस प्रतिबिम्ब में
आज के दूषणों की भी सब परछाइयां।।1।।
 
फिर विजयादशमी की शाम प्रसन्न मन,
लौटते हैं घर को विजयी भाव में।
अब अपना जीवन निरंतर शांतिमय,
बीतेगा अच्छाइयों की छांव में।।2।।
 
दूसरे दिन पर ताजे अखबार में वे ही चर्चे,
दुष्ट रावणों के चारों ओर से।
आतंकियों, माफियाओं, घूसखोरों, दलालों,
पाखंडियों, बलात्कारियों के जघन्य घनघोर से।।3।।
 
हर बार उस आग की लौ से निकल,
वह रावण-तत्व ओझल हो जाता है चुपचाप।
और हम उलझ जाते हैं जिंदगी की आतिशबाजियों में,
अपनी अजानी किसी भूल पर करते हुए से पश्चाताप।।4।।
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें

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