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कविता : ये पैंतालिसी तेवर गर्मी के...

Updated: सोमवार, 4 जून 2018 (16:25 IST)
चालीस डिग्री गर्मी को भूल गए हम। 
अब तो पैंतालिस का ही सामान्य चलन है।  
पहले नव तपा होता था फक्त नौ दिन,
अब पैंतालिस दिन नवतपे की ही तपन है ।। 1।। 
 
पैंतालिस से ज्यादा वाले नगरों का 
हम पढ़कर अखबार में, 
सोचते हैं/कि अपने यहां तो कम है। 
बेजंगल रेगिस्तान बन गए सब भू-प्रान्तर 
उथले जलाशय, पाताल पहुंचा भू-जल स्तर,
इस पर जो भी हो जाय, सो कम है ।।2।। 
 
बेमतलब हुआ मालव-निमाड़ का अन्तर। 
'पग-पग नीर' की उक्ति 
बस एक भूली कहावत हो गई। 
बरस रही है आग सी चारों तरफ,
छेड़-छाड़ से क्रुद्ध प्रकृति देवी की 
जैसे अदावत हो गई ।। 3 ।। 
 
उनींदे से पेड़, अधमरे पशु सब,
पंछी जा छुपे कोटरों में। 
भिन्ना रहे ए.सी. ऊंची मल्टियों में,
हांफ रहे कूलर छोटे घरों में ।। 
नमन उन श्रमिकों को जो अपने कान बांधे हुए 
फिर भी निर्विकार कार्यरत,
आग उगलते सूरज के नीचे,
गर्मी के पैंतालिसी तेवरों में ।। 4।। 
 
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें

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