biodatamaker
✕

हिन्दी कविता : परिवर्तन

Updated: शुक्रवार, 31 मार्च 2017 (11:43 IST)
परिवर्तन की निश्चित धारा में,
जब एक नहीं बहेगा हमारा 'मैं'।
तब तक सदा परिवर्तनशील समय,
जकड़ा रहेगा उम्रकैदी की मानिंद।
 
अहंकार की काल-कोठरी में,
जलवायु का परिवर्तन कष्टकारी है।
कठिन है किंतु स्वीकार्य है,
प्राकृतिक परिवर्तन भी देते हैं आनंद।
 
हर वर्ष नव पल्लव उगकर,
देते हैं धरा को नवजीवन।
प्रकृति का हर रूप परिवर्तन के प्रति,
सजग और संवेदनशील है।
 
परिवर्तन मनुष्य भी चाहता है,
लेकिन स्वयं में नहीं,
हम हमेशा दूसरों में चाहते हैं परिवर्तन।
 
स्वयं के जड़ संस्कारों और गंदलेपन को,
तरजीह देते हैं हमेशा दूसरों पर,
उछालते हैं कीचड़ अपनी जमी हुई काई की।
 
हम नहीं बदलना चाहते अपनी त्वरा को,
हम संतुष्ट हैं अपनी कूपमंडूकता से।
हमारा शरीर यात्रा कर लेता है,
जन्म से अंत्येष्टि तक की।
 
किंतु हमारा 'मैं' अपरिवर्तनीय है,
जन्म से मृत्यु तक एक ठूंठ की तरह।
परिवर्तन की निश्चित धारा में,
बहा आओ अपना अहंकार।
 
परिष्कृत होंगे तुम्हारे विचार,
जन्मेगा प्रगति का नव पल्लव, 
प्रशस्त होंगे विकास पथ।
लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें
Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक मंच पर बढ़ायी भारत की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान

नया भारत, नई उड़ान: मोदी युग में आत्मविश्वास का नया शिखर

17 सितंबर जन्मदिन पर विशेष: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में 25 दिलचस्प बातें

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

हिंदी दिवस विशेष: जानिए कैसे हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित रह गई?

अगला लेख