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Poem on Holi : होली का मादक रंग

Updated: सोमवार, 22 मार्च 2021 (17:44 IST)
Holi Festival Poem
 
मौसमी करवटों में बदल रहा स्वरूप वन-प्रांतर का,
प्रकृति नटी के गालों पर लाल पलाशी उमंग। 
वृक्षों की डालियां झूम-झूम ले रहीं हिलोर,
अल्हड़ मदभरी फागुनी बयारों के संग।।1।। 
 
हवाओं की सरसराहटों में कैसी अबूझ तान,
पतझड़ी पत्तों की खड़क में बज रही मृदंग। 
प्रेमियों के विकल मन में दस्तकों से मदनोत्सव की,
बन रहीं अनगिन अजानी चाहतों की सुरंग।।2।।
 
वसंत प्रेरित कामनाएं, वासंती अकुलाहटें,
राधा-माधव के ह्रदय-सागर में ज्वारीय तरंग। 
चंद्रकिरणों में गुंजित कान्हा की मधुरिम बांसुरी,
चंद्रमुग्ध चकोर सा बेसुध राधा का मन-विहंग ।।3।।
 
पुष्प-सज्जित चाप ले छुपा यहीं-कहीं अनंग। 
ध्यान-योगी शिव का भी जो करे ध्यान भंग ।।
व्यर्थ ही जन्मा जगत में, उम्र ले अनायास,
जिस पर न चढ़ा यौवन में, होली का मादक रंग ।।4।।

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लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें

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