ramcharitmanas
✕

कविता : व्यंग्य हास-परिहास

Updated: बुधवार, 7 फ़रवरी 2018 (17:26 IST)
दोहा बन गए दीप-15 
 
मंचों की कविता बनी, कम वस्त्रों में नार, 
नटनी नचनी बन गई, कुंद हो गई धार।
 
नौसिखिये सब बन गए, मंचों के सरदार, 
कुछ जोकर से लग रहे, कुछ हैं लंबरदार। 
 
पेशेवर कविता बनी, कवि है मुक्केबाज, 
मंचों पर अब दिख रहा, सर्कस का आगाज। 
 
मंचों पर सजते सदा, व्यंग्य हास-परिहास, 
बेहूदे से चुटकुले, श्रृंगारिक रस खास। 
 
भाषायी गुंजन बना, द्विअर्थी संवाद, 
श्रोता सीटी मारते, कवि नाचे उन्माद। 
 
कुछ वीरों पर पढ़ रहे, कुछ अश्लीली राग, 
कुछ अपनी ही फांकते, कुछ के राग विराग। 
 
संस्कार अब मंच के, फिल्मी धुन के संग, 
कविता शुचिता छोड़कर, रंगी हुई बदरंग। 
 
मंचों से अब खो गया, कविता का भूगोल, 
शब्दों के लाले पड़े, अर्थ हुए बेडौल।
 
अर्थहीन कवि हो गए, कविता अर्थातीत,
भाव हृदय के खो गए, पैसों के मनमीत।
लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शक्ति और सामर्थ्य से सार्थक हो रहा है भारत

चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

रूस दे रहा है नाटो को परमाणु हथियारों की धमकी, NATO कमांड केन्द्रों पर हो सकते हैं हमले

शारदीय नवरात्रि व्रत 2026: रोज-रोज साबूदाने की खिचड़ी खाने के 6 नुकसान

सबके लिए समय है... फिर अपने सपनों के लिए क्यों नहीं?

अगला लेख