sawan somwar

काव्य संसार : बातें मन की

Updated: बुधवार, 18 मई 2016 (12:21 IST)
इम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज के सामने खड़ा हुआ मैं
देखता हूं इसे मनकामेश्वर मंदिर की तरह
 

 
भीषण गर्मी और तपन में
शरीर आज बेहाल है।
आंखें थकी हुई हैं
प्रतीक्षा करते हुए
 
ऐसे में चिढ़ा रहा है मुझे
सामने लगा हुआ पार्टी का पोस्टर।
जो घोषणा कर रहा है रोजगार हर व्यक्ति को
 
मिमियाते-घिघियाते हुए मैं आगे बढ़ रहा हूं
सामने बैठा हुआ है 'निष्ठुर बाबू'
दिखाता हूं उसे 'दस' के इकलौते नोट को
देखता है वह मुझे ऐसे घूरकर
जैसे किया हो गंभीर अपमान उसका
शब्दों के इशारों में उसने मुझे समझाया
एक जीरो है तुमको और बढ़ाना
 
याद करता हूं उस दिवस को
जिस दिन दाखिला लिया था स्कूल में
कसम खाई थी एक ईमानदार ना‍गरिक बनने की
चप्पलें टूट गई हैं व्यवस्था से लड़ते
दफन हैं सब आदर्श इस भीड़तंत्र में
जो अब बन गया है भ्रष्टाचार का तंत्र
 
कमीशन पर्याय है कमीशनबाजी का
जीवन पर्याय है सौदेबाजी का
टूट जाता है यूं ही युवक लड़ते-लड़ते
जय-जयकार करते हुए भीड़तंत्र की। 
 
 
लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी
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