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ग़ज़ल- आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है

Updated: सोमवार, 24 फ़रवरी 2020 (17:11 IST)
सियासत की जाने कैसी ये आग है,
आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है।
 
उन्हें सिखा रहे हो उसूल मुहब्बत के
नफ़रत से जिनके चूल्हों में आग है
 
ए गुमराह मुंसिफ़ पाकीज़ा ना तेरा दामन
मुफ़लिसों के लहू का उस पर भी दाग है
 
उनसे शिकायत कैसी वो गैर जो ठहरे
मुल्क जला रहे जो घर के चिराग हैं
 
गाफ़िल नहीं अजी हम खूब समझते हैं
तख्त-ओ-ताज की सारी ये दौड़ भाग है।

(शाहीन-बाज/शिकारी पक्षी, उसूल-सिद्धान्त, मुंसिफ़-न्यायाधीश, मुफ़लिस-गरीब/बेसहारा, गाफ़िल-विमुख/लापरवाह)
पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com 
 
 
लेखक के बारे में
पं. हेमन्त रिछारिया
ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया ज्योतिष प्रभाकर उपाधि से सम्मानित हैं। विगत 12 वर्षों से ज्योतिष संबंधी अनुसंधान एवं ज्योतिष से जुड़ी गलत धारणाओं का खंडन कर वास्तविक ज्योतिष के प्रचार-प्रसार में योगदान दे रहे हैं। कई ज्योतिष आधारित पुस्तकों का लेखन।.... और पढ़ें

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