हवा, जो चंपा से बहकर आई

फाल्गुनी

स्मृति आदित्य|
तुम, एक हवा जो चंपा से बहकर आई
तुम, एक जो से छनकर आई


तुम, एक नदी जो मेरी आँखों से छलछल आई
तुम, एक जो मेरी मुट्ठी में बँधकर आई


तुम, एक जो मन की में ठंडक लाई
तुम, एक जो मेरे दिल में उतर आई

तुम, जिसे अब तक भूला नहीं पाई
तुम, में खुली आँखें जिन्हें अब तक सुला नहीं पाई।



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