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धनपतराय से मुंशी प्रेमचंद तक का सफर...

Updated: सोमवार, 30 जुलाई 2018 (17:03 IST)
प्रस्तुति : रोहित कुमार 'हैप्पी'

मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। तीन लड़कियों की पीठ पर होने से आप तेतर कहलाए। पिता ने 'धनपतराय' नाम दिया था, तो चाचा प्यार से नवाबराय बुलाते थे। आप 'उर्दू' से हिन्दी' लेखन में आए। आप 'नवाबराय' नाम से उर्दू में लिखते थे। उनकी 'सोजे वतन' (1909, जमाना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर ली थीं।
 
सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए उर्दू अखबार 'जमाना' के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने नबावराय के स्थान पर आपको 'प्रेमचंद' नाम से लिखना सुझाया। यह नाम आपको इतना पसंद आया कि 'नवाबराय' के स्थान पर आप 'प्रेमचंद' हो गए। अब आप 'प्रेमचंद' के नाम से लिखने लगे।
 
'प्रेमचंद और उनका युग' में डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं, 'प्रेमचंद का नवाबराय नाम किस तरह छिना था यह उल्लेख किया जा चुका है, लेकिन अपनी मुसीबतों पर हंसते हुए उन्होंने 'नवाब' को निरर्थक ठहराया और 'प्रेम' की ठंडक और संतोष का अकाट्य तर्क पेश किया।'
 
एक बार सुदर्शनजी ने प्रेमचंद से पूछा- 'आपने नवाबराय नाम क्यों छोड़ दिया?'  
 
प्रेमचंद का उत्तर : 'नवाब वह होता है जिसके पास कोई मुल्क हो। हमारे पास मुल्क कहां?' 'बे-मुल्क नवाब भी होते हैं।'
 
प्रेमचंद 'मुंशी प्रेमचंद' कैसे बने? : प्रेमचंद ने अपने नाम के आगे 'मुंशी' शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। 'मुंशी' शब्द वास्तव में 'हंस' के संयुक्त संपादक कन्हैयालाल मुंशी के साथ लगता था। दोनों संपादकों का नाम हंस पर 'मुंशी, प्रेमचंद' के रूप में प्रकाशित होता था।
 
अत: मुंशी और प्रेमचंद दो अलग व्यक्ति थे लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ कि प्रेस में 'कॉमा' (,) भूलवश न छपने से नाम 'मुंशी प्रेमचंद' छप जाता था और कालांतर में लोगों ने इसे एक नाम और एक व्यक्ति समझ लिया यथा प्रेमचंद 'मुंशी प्रेमचंद' नाम से लोकप्रिय हुए।
 
 

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