डाली : विद्रोही तेवर के शिल्पी

SubratoND
मैं कभी भी स्पेन नहीं गया, डाली को मैंने कभी रूबरू नहीं देखा, फिर भी डाली ने मुझे विद्यार्थी जीवन से ही प्रभावित किया था। मेरी जीवनधारा कभी भी डाली की जैसी नहीं थी, कारण कि मेरा जीवन, मेरा समाज सभी कुछ एकदम भिन्न थे, लेकिन जिस चित्र-दर्शन का मैं आजीवन पालन करता आया वह मेरी नजर में डाली की तरह ही अभिन्न है।

स्पेन का राष्ट्रीय खेल बुल फाइटिंग है। एक जंतु को दौड़ा-दौड़ाकर हजारों लोगों के मनोरंजन के लिए वे लोग मारते हैं जिस देश के लोगों का मनोरंजन इतना नृशंस होता है, उनके साथ ही मेरी जीवनधारा का कोई मेल संभव ही नहीं। रक्तपात देखकर कम-से-कम मुझे तो कभी भी आनंद की अनुभूति नहीं हुई।

जितना मुझे मालूम है कि सर्रियलिज्म का उद्‍भव पेरिस या उसके आसपास हुआ था जो कि केवल चित्रकला तक ही सीमित नहीं था, बल्कि कहना चाहिए कि तमाम कला-माध्यमों में वह अभिव्यक्त हुआ था। तमाम सर्रियलिस्ट लेखक, कवि, कलाकारों ने उस समय इस आंदोलन को चलाया था। कवि ऐपोलोनियर, नाटककार आयोनेस्को, ब्रेष्ट तथा सर्वोपरि डाली के दोस्त फिल्मकार लुई बुन्वेल के बारे में कहना चाहिए। ये लोग एकसाथ चर्चाएँ किया करते, घूमा-फिरा करते, कहा जा सकता है कि इन लोगों ने एक नए शिल्पदर्शन को जन्म दिया था।
  स्पेन का राष्ट्रीय खेल बुल फाइटिंग है। एक जंतु को दौड़ा-दौड़ाकर हजारों लोगों के मनोरंजन के लिए वे लोग मारते हैं जिस देश के लोगों का मनोरंजन इतना नृशंस होता है, उनके साथ ही मेरी जीवनधारा का कोई मेल संभव ही नहीं।      


मॉडर्न रूस के विद्रोही फिल्मकार तारकोवस्की भी विशेष रूप से स्मरण योग्य हैं। हम लोगों को इन लोगों से अनोखी शिल्प-रचनाएँ मिली हैं। वह समय जबर्दस्त तोड़फोड़ में से गुजर रहा था। पश्चिम के कला-जगत में एब्स्ट्रक्ट आर्ट के नाम पर तमाम अनाचार चल रहा था, जिसके बुरे परिणाम हमें आज भी मिल रहे हैं। भारत के सर्रियलिस्ट शिल्प के बारे में कहना हो तो मुझे रामकिंकर, हेमंत मिश्र और गगनेंद्रनाथ की याद आती है। गगनेंद्रनाथ के चित्रों में स्थापत्य शिल्प के साथ ‍सर्रियलिज्म का समावेश था और चित्रों का रंग भी सफेद और काले पर आधारित था।

पचास या साठ के दशक में जब मैंने चित्र बनाने की शुरुआत की तब जिन चित्रों की प्रतिलिपि देखने का मौका मुझे मिलता था, वे मूलत: 'भारतवर्ष' तथा 'मॉडर्न रिव्यू' पत्रिका में छपे होते थे। तब भारतीय चित्रकला के रूप में टैगोर हाउस की शिल्पचर्चा की ही प्रधानता थी। व्यक्तिगत रूप से किसी ने खास आकर्षित नहीं किया था, रवींद्रनाथ और गगनेंद्रनाथ के बाद। सिर्फ थोड़े समय के लिए कम्युनिस्ट आंदोलन के बाद थोड़ा-सा सोमनाथ होर, जैनल आबिदीन में और सबसे ज्यादा बंगला गणनाट्‍य आंदोलन से मिला था।

इसी वजह से चित्रचर्चा के शुरू में ही मुझे पाश्चात्य चित्रकला की तलाश करनी पड़ी थी और उस राह पर चलकर रफेल, बोतिचेल्ली, रेमब्राँ, माइकेलएंजिला से शुरू कर इंप्रेशइनस्टों के प्रति आकर्षित हो गया था। और इसी सिलसिले में मुझे डाली के बारे में पता चला था।

रवींद्र व्यास|
- विकास भट्‍टाचार्य
एक पुरुष जिस तरह अपना सारा आवेग, क्षोभ, दु:ख, क्रोध अभिव्यक्त कर सकता है, वैसा डॉली ने बहुत सार्थक रूप में किया है। डाली का मुल्क स्पेन है, जहाँ तक मैं जानता हूँ ब्रिटेन से वह एकदम अलग है। इतिहास बताता है कि स्पेन में बार-बार राजनीतिक उथल-पुथल होती रही है।


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