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Rath Saptami 2026: रथ सप्तमी का अर्थ, आरती, पूजा विधि, चालीसा और लाभ

WD Feature Desk
शनिवार, 24 जनवरी 2026 (15:17 IST)
Ratha Saptami, Sun God Worship: हिंदू पंचांग के अनुसार रथ सप्तमी माघ शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है और यह विशेष रूप से सूर्य देव की उपासना का पर्व है। इस दिन को सूर्य सप्तमी भी कहा जाता है। रथ सप्तमी का दिन सूर्य देव के रथ पर सवार होने के प्रतीक रूप में मनाया जाता है। इसे 'अचला सप्तमी' या 'सूर्य जयंती' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से सूर्य देव की पूजा की जाती है, क्योंकि मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव पृथ्वी से संपर्क बढ़ाते हैं, जिससे समस्त जीवों के जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि का संचार होता है। इस वर्ष रथ या अचला सप्तमी का पर्व 25 जनवरी 2026, दिन रविवार को मनाया जा रहा है। 

1. रथ सप्तमी का अर्थ
2. रथ सप्तमी आरती
3. रथ सप्तमी पूजा विधि
4. रथ सप्तमी चालीसा 
5. रथ सप्तमी लाभ
6. रथ सप्तमी-FAQs
 
यहां रथ सप्तमी से जुड़ी संपूर्ण जानकारी आपकी सुविधा के लिए दी जा रही है:
 

1. रथ सप्तमी का अर्थ:


रथ सप्तमी भगवान सूर्य नारायण स्वामी का त्योहार है। इसे भगवान सूर्य के जन्म दिवस तथा सूर्य जयंती के रूप में भी जाना जाता है। रथ सप्तमी में 'रथ' का अर्थ है वाहन और 'सप्तमी' का अर्थ है सातवीं तिथि। सूर्यदेव के रथ में 7 घोड़े होते हैं, जो सप्ताह के 7 दिनों और इंद्रधनुष के 7 रंगों का प्रतीक हैं। इस दिन को सूर्य के उत्तरायण की पूर्णता और ऋतु परिवर्तन के संकेत के रूप में मनाया जाता है।
 

2. रथ सप्तमी आरती:


श्री सूर्यदेव की आरती करने से घर का वातावरण शुद्ध होकर नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं।
 
श्री सूर्यदेव- ॐ जय सूर्य भगवान।
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी।।
अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते।।
फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
संध्या में भुवनेश्वर अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते।।
गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते। आदित्य हृदय जपते।।
स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी। दे नव जीवनदान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार। महिमा तब अपरम्पार।।
प्राणों का सिंचन करके भक्तों को अपने देते। बल, बुद्धि और ज्ञान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
भूचर जलचर खेचर, सबके हों प्राण तुम्हीं। सब जीवों के प्राण तुम्हीं।।
वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने। तुम ही सर्वशक्तिमान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
पूजन करतीं दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल। तुम भुवनों के प्रतिपाल।।
ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी। शुभकारी अंशुमान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
 
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।स्वरूपा।।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
 

3. रथ सप्तमी पूजा विधि:

पूजा विधि: इस दिन सूर्य देव की आराधना आरोग्य और सुख-समृद्धि देने वाली मानी जाती है।
 
ब्रह्म मुहूर्त स्नान: इस दिन सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी या घर पर ही जल में गंगाजल डालकर स्नान करना चाहिए। संभव हो तो सिर पर सात आक के पत्ते रखकर स्नान करने का विधान है।
 
अर्घ्य दान: स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, अक्षत और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
 
दीपदान: सूर्य देव के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
 
भोग: सूर्य देव को केसरिया भात या खीर का भोग लगाएं।
 
मंत्र जाप: 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' या 'ॐ सूर्याय नमः' का जाप करें।
 

4. रथ सप्तमी चालीसा


सूर्य चालीसा: सूर्य के सम्मुख बैठकर श्रद्धापूर्वक संपूर्ण सूर्य चालीसा का पाठ करें। सूर्य चालीसा के पाठ से मानसिक शांति और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। 
 
श्री सूर्य चालीसा
 
दोहा
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
 
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर, 
सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, 
सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
 
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, 
मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, 
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
 
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, 
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, 
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
 
मंडल की हिमा अति न्यारी, 
तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, 
देखि पुरन्दर लज्जित होते।
 
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
आदित्य, नाम लै, 
रण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, 
मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै, 
दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
 
नमस्कार को चमत्कार यह, 
विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, 
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
 
बारह नाम उच्चारन करते, 
सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन, 
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, 
प्रबलमोह को फंद कटतु है।
 
अर्क शीश को रक्षा करते, 
रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,
कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
 
भानु नासिका वास करहु नित, 
भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, 
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
 
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, 
तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, 
त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
 
युगल हाथ पर रक्षा कारन, 
भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर,
कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
 
जंघा गोपति, सविता बासा, 
गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, 
बाहर बसते नित तम हारी।
 
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, 
रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, 
भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
 
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, 
जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, 
नव प्रकाश से आनन्द भरता।
 
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, 
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके,
धर्मराज सम अद्भुत बांके।
 
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, 
किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, 
दूर हटत सो भव के भ्रम सों।
 
परम धन्य सो नर तनधारी, 
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, 
मध वेदांगनाम रवि उदय।
 
भानु उदय वैसाख गिनावै, 
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, 
कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, 
पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
 
दोहा
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।
 

5. रथ सप्तमी लाभ:

 
* आरोग्य की प्राप्ति: सूर्य को 'आरोग्यं भास्करदिच्छेत' कहा गया है। इस दिन व्रत और पूजा करने से त्वचा रोगों और नेत्र दोषों से मुक्ति मिलती है।
 
* संतान सुख: ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से सौभाग्यवती स्त्रियों को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।
 
* पापों का नाश: सात जन्मों के संचित पापों से मुक्ति मिलती है, इसीलिए इसे 'अचला सप्तमी' भी कहते हैं।
 
* सफलता: सूर्य तेज और मान-सम्मान के कारक हैं। उनकी पूजा से करियर और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है।

6. रथ सप्तमी-FAQs


प्रश्न 1. रथ सप्तमी क्यों मनाई जाती है?
उत्तर: पौराणिक कथाओं के अनुसार, माघ शुक्ल सप्तमी को भगवान सूर्य ने अपने सात घोड़ों वाले रथ के साथ ब्रह्मांड को आलोकित करना शुरू किया था। यह दिन ऋतु परिवर्तन और उत्तरायण की गति में तेजी का प्रतीक भी है, जिससे धीरे-धीरे गर्मी बढ़ने लगती है।
 
प्रश्न 2. अर्का (मदार) के पत्तों का क्या महत्व है?
इस दिन दक्षिण भारत में विशेष रूप से 'अर्का' (मदार या आक) के पत्तों को सिर, कंधों और घुटनों पर रखकर स्नान करने की परंपरा है। माना जाता है कि ऐसा करने से शारीरिक व्याधियाँ दूर होती हैं और मानसिक शांति मिलती है।
 
प्रश्न 3. इस दिन कौन से मुख्य अनुष्ठान किए जाते हैं?
उत्तर: पवित्र स्नान: सूर्योदय से पहले (अरुणोदय काल में) स्नान करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
अर्घ्य दान: तांबे के लोटे में जल, अक्षत और लाल फूल लेकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सूर्य नमस्कार: इस दिन सूर्य नमस्कार करना बहुत शुभ होता है।
खीर का भोग: मिट्टी के बर्तन में दूध उबालकर सूर्य की किरणों के नीचे रखा जाता है और उससे प्रसाद बनाया जाता है।
 
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