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कितनी अतृप्ति है
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नीरज कितनी अतृप्ति है जीवन में ?मधु के अगणित प्याले पीकर,कहता जग तृप्त हुआ जीवन,मुखरित हो पड़ता है सहसा,मादकता से कण-कण प्रतिक्षण,पर फिर विष पीने की इच्छा क्यों जागृत होती है मन में ?कवि का विह्वल अंतर कहता, पागल, अतृप्ति है जीवन में।