गुणों के देव : भगवान श्री गणेश
गणपति चतुर्थी विशेष
श्री नरहरि पटेल
गणेश हमारी संस्कृति के मंगलमूर्ति देव हैं । वैसे तो हमारे समस्त देवी-देवताओं में दातापन है, किन्तु गणेश मंगलदाता हैं। वे सारे काज निर्विघ्न पूर्ण करते हैं। हमारे लोकगीतों में उनकी प्रशस्ति के गीत हैं। मालवी लोकगीतों में तो गणेश की पारस की मूर्ति बनाने की कल्पना है, जिसे छू कर हमारा विकारी जीवन स्वर्ण बन जाए। दरअसल, गणेश हमारे सोच, चिंतन, धारणा और व्यवहार में इसलिए पूजनीय हैं क्योंकि वे गुणों की खान हैं। उनमें समस्त गुण और शक्तियाँ शोभायमान हैं। श्री गणेश अर्थात् श्री गुणेश। वे श्री अर्थात् श्रेष्ठ तो हैं ही, देवताओं में गुणों के देव हैं।
आज जगह-जगह अमंगल का साम्राज्य है। दुर्गुणों का बोल-बाला है। हिंसा, क्रोध और विकारों से भरपूर है पूरा जीवन। विवेक लुप्त है। सहानुभूतियाँ गुम हैं। धर्म के नाम पर आडम्बर शीर्ष पर है। मनुष्य मात्र जैसे अपने लक्ष्य अर्थात् अन्तरदर्शन को भूल गया है। ज्ञान और विवेक ही जब विलुप्त है तो फिर आदमी से दैवोचित व्यवहार की उम्मीद कैसे की जाए? गणेश हमें दैवोचित गुणों को धारण करने की प्रेरणा देते हैं।PR
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सच पूछो तो हमारे देवताओं की पवित्र नज़रों में निहाल करने की शक्तियाँ हैं। इसीलिए तो आज भी उनकी जड़-मूर्तियों के सम्मुख लाखों, हज़ारों लोग सिर टेकते हैं, मन्नतें माँगते हैं और कल्याण की कामना करते हैं। गणेश विघ्न-विनाशक मंगलमूर्ति देव ऐसे देव हैं जिनका दर्शन मात्र हमारे समस्त विकारों का नाश करता है।
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