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Eid Milad Un Nabi 2024: ईद मिलादुन्नबी आज, जानें महत्व और इतिहास

Written By WD Feature Desk
Updated: सोमवार, 16 सितम्बर 2024 (09:55 IST)
Highlights 
 
* साल 2024 में कब मनाई जाएगी ईद-ए-मिलादुन्नबी। 
* ईद-ए-मिलादुन्नबी क्यों मनाई जाती है।
* हजरत मोहम्मद साहब का जन्मदिन।
 
Eid Milad Un Nabi : वर्ष 2024 में 16 सितंबर, दिन सोमवार को मौलिद-उन-नबी/ ईद-ए-मिलादुन्नबी का पर्व मनाया जा रहा है। इसी दिन मक्का/ सऊदी अरब में हजरत मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था। उनके वालिद साहब का नाम अबदुल्ला बिन अब्दुल मुतलिब था और वालेदा का नाम आमेना था। इसे संसार का सबसे बड़ा जश्न माना जाता है। 
 
यह दिन पैगंबर मोहम्मद के जन्म की खुशी के रूप में मनाया जाता है और इन्हें इस्लाम में अंतिम नबी माना गया है। हजरत मोहम्मद साहब के जन्म के दो माह बाद ही पिता का स्वर्गवास हो गया था। अत: उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया। पैगंबर मोहम्मद साहब बचपन से ही अल्लाह की इबादत में लीन रहते थे। वे कई-कई दिनों तक मक्का की एक पहाड़ी पर, जिसे अबलुन नूर कहते हैं, इबादत किया करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था में उन्हें अल्लाह की ओर से संदेश प्राप्त हुआ। 
 
अल्लाह ने एक अवतार के रूप में हजरत मोहम्मद साहब को पृथ्वी पर भेजा था, क्योंकि उस समय अरब के लोगों के हालात बहुत खराब हो गए थे। लोगों में शराबखोरी, जुआखोरी, लूटमार, वेश्यावृत्ति और पिछड़ापन भयंकर रूप से फैला हुआ था। कई लोग नास्तिक थे। ऐसे माहौल में मोहम्मद साहब ने जन्म लेकर लोगों को ईश्वर का संदेश दिया। इसी वजह से मिलादुन्नबी यानी इस्लाम के संस्थापक पैगंबर मोहम्मद साहब का जन्मदिन रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख को मनाया जाता है। 
 
अल्लाह ने फरमाया- 'ये सब संसार सूर्य, चांद, सितारे मैंने पैदा किए हैं। मुझे हमेशा याद करो। मैं केवल एक हूं। मेरा कोई मानी-सानी नहीं है। लोगों को समझाओ।' हजरत मोहम्मद साहब ने ऐसा करने का अल्लाह को वचन दिया। तभी से उन्हें नुबुवत प्राप्त हुई। 
 
हजरत मोहम्मद साहब ने खुदा के हुक्म से जिस धर्म को चलाया, वह इस्लाम कहलाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है- 'खुदा के हुक्म पर झुकना।' इस्लाम का मूल मंत्र है- 'ला ईलाहा ईल्लला मोहम्मदन-रसूलल्लाह' जो कलमा कहलाता हैं। इसका अर्थ है- 'अल्लाह सिर्फ एक है, दूसरा कोई नहीं। मोहम्मद साहब उसके सच्चे रसूल हैं।' 
 
हजरत मोहम्मद साहब को लोगों को इस्लाम धर्म समझाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। दुश्मनों के जुल्मो-सितम को सहन करना पड़ा। वे जरूरतमंदों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। वे दीन-दुखियों के सच्चे सेवक थे। 
 
उनके जन्म के समय अरब में महिलाओं की बड़ी दुर्दशा थी। उन्हें बाजार की पूंजी समझा जाता था। लोग उन्हें खरीदते-बेचते थे और भोग-विलास का साधन मानते थे। लड़की का जन्म अशुभ माना जाता था और लड़की पैदा होते ही उसका गला दबाकर मार दिया जाता था। 
 
हजरत मोहम्मद साहब ने जब यह बात देखी तो उन्होंने औरतों की कद्र करना लोगों को समझाया। उन्हें समानता का दर्जा देने को कहा। साम्यवाद की बात भी सर्वप्रथम हजरत मोहम्मद साहब ने लोगों के सामने रखी थी। एक बार मस्जिद तामीर हो रही थी। वे भी मजदूरों में शामिल होकर काम करने लगे। लोगों ने कहा- 'हुजूर, आप यह काम अंजाम न दें।' 
 
इस पर पैगंबर साहब ने फरमाया- 'खुदा के नेक काम में सब बराबरी के साथ हाथ बंटाते हैं।' उनका कहना था कि लोगों को नसीहत तब दो, जब आप खुद उसका कड़ाई से पालन कर रहे हों। 28 सफर हिजरी सन्‌ 11 को 63 वर्ष की उम्र में पैगंबर साहब वफात हुए। और हजरत मोहम्मद साहब की मजार-शरीफ मदीना मुनव्वरा में है।  जिबराईल इस पवित्र कुरआन को लेकर मोहम्मद साहब के दर पर आए। हजरत मोहम्मद साहब पर जो खुदा की पवित्र किताब उतारी गई है, वह है कुरआन।

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