दिलीप कुमार : एक महानायक की गाथा

पगडंडी से राजमार्ग का सफर

Dilip Kumar
WD
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पहले आम चुनाव के समय से कांग्रेस पार्टी के लिए प्रचार कार्य करते रहे हैं। बीच में कुछ समय के लिए कांग्रेस से उनका मोहभंग भी हो गया था, लेकिन सन 2000 में वे राज्यसभा में कांग्रेस सदस्य रहे। फिल्म उद्योग की समस्याओं के निराकरण के लिए भी वे स‍दैव सक्रिय रहे। फुटबॉल और क्रिकेट उनके पसंदीदा खेल थे।

अभिनेता दिलीप कुमार उर्फ यूसुफ खान का जन्म पेशावर के एक पठान परिवार में हुआ था। पठान शब्द फतेहमान (यानी विजेता) का बिगड़ा हुआ रूप है। भी पेशावर के पठान थे। यूसुफ के पिता मोहम्मद सरवर खान फलों के व्यापारी थे और कोलकाता, मुंबई आया-जाया करते थे। यूसुफ की माता का नाम आयशा बेगम था। इस दं‍पति को कुल छह पुत्र और छह पुत्रियों की प्राप्ति हुई जिनमें से कुछ बच्चे मुंबई और देवलाली (नासिक) में पैदा हुए। पेशावर में सरवर खान का परिवार खुदादाद मोहल्ले में रहता था, जहाँ उनकी पुश्तैनी जमीन अभी भी है। बचपन में घर में सख्‍त अनुशासन का माहौल था।

यूसुफ अपने माता-पिता के तीसरे पुत्र थे। दो बड़े भाइयों के नाम नूर मोहम्मद और अय्यूब थे। दूसरा पुत्र अय्यूब ही परिवार के पेशावर से मुंबई आने का कारण बना। वह घोड़े से गिर जाने के कारण इतना जख्‍मी हुआ था कि उसे मुंबई लाना पड़ा। उसकी रीढ़ की हड्‍डी टूट गई थी। बेबस अय्यूब घर में बैठकर ही अध्ययन करता रहा और उसने धर्म और साहित्य के प्रति यूसुफ को जागरूक बनाया।

दिलीप कुमार को पेशावर की कड़कड़ाती, चमड़ी छील देने वाली सर्दी की याद है। दीवान और कोठा, चटाई और नमदे, गुलाबी चाय और पेशावरी कुलचे, रोगिनी-रोटी या हलीम भी याद है। पेशावर के घर में हिंडको भाषा बोली जाती थी, जो प्राय: उर्दू और फारसी का मिश्रण थी। पश्तो सभी बच्चों को पढ़ाई जाती थी। घर के सब लोग पश्तो पढ़ना-लिखना जानते थे, लेकिन यूसुफ लिखना नहीं सीखे। दादा हाजी मोहम्मद फारसी जानते थे और शायरी के शौकीन थे। यानी घर का माहौल उजाड़ किस्म का नहीं था, जैसा कि आम अफगानियों के बारे में समझा जाता है।

घर के पास ही मस्जिद के अहाते में मदरसा था, जहाँ यूसुफ भी अपने बड़े भाई नूर मोहम्मद और अय्यूब के साथ जाया करते थे। पास ही एक मजार थी और बेर की झाड़ियाँ भी दूर नहीं थीं। ऐसे ही एक बार बेर खाते समय उसने दो नौजवानों को खूनी लड़ाई लड़ते देखा था और डरकर भाग आया था। बचपन में ही उसने दो शिया लड़कों की हत्या की घटना भी देखी थी और अम्मा के पीछे-पीछे वह घटना वाले घर में चला गया था, जहाँ पुलिस आई थी और डरकर यूसुफ एक पलंग के नीचे छिप गया था। पुलिस ने लाश वाले कमरे को बाहर से बंद कर दिया था और यूसुफ दोनों लाशों के साथ कमरे में अकेला रह गया था। उस रात का हॉरर दिलीप कुमार को अभी भी याद है।

साहित्य से सरोकार
यूसुफ पर अपने बड़े भाई अय्यूब का गहरा प्रभाव पड़ा। अय्यूब ज्ञानी और कवि था। उसके पास अँगरेजी साहित्य की अनेक पुस्तकें थीं। इस कारण यूसुफ को शेक्सपीयर, बर्नार्ड शॉ, मोपासाँ, डिकेंस आदि को पढ़ने का मौका मिला और साहित्य के प्रति उसके मन में अनुराग पैदा हुआ। जब अय्यूब 12 साल का था, तब अपने बड़े भाई नूर मोहम्मद के साथ फलों की खरीदी के लिए कश्मीर गया था। वहाँ वह घोड़े से गिर पड़ा और उसकी रीढ़ की हड्‍डी टूटने के साथ ही किडनी भी खराब हो गई।

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अभिनेता के साथ नेता
इसी दुर्घटना के कारण दिलीप कुमार के परिवार को मुंबई शिफ्‍ट होना पड़ा और जब मुंबई की जलवायु उसके उपचार के प्रतिकूल पाई तो सरवर खान ने परिवार को देवलाली में रखा। पहले वे किराए के मकान में रहे और बाद में बंगला बनाया। यूसुफ ने देवलाली में बर्नेस और मुस्लिम बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की। बीमार अय्यूब ने घर में रहकर ही पढ़ाई की। 16 साल की उम्र में अय्यूब ने नासिक में पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर एक सभा में 45 मिनट तक भाषण दिया और उसकी खूब सराहना हुई। अय्यूब की देखादेखी ही यूसुफ ने कुरआन में गहन दिलचस्पी दिखाई और अँगरेजी साहित्य को भी खंगाल मारा।



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