पीले पन्नों से उड़ती गुलाबी दिनों की खुशबू

इस बार 'तुम जो मेरे हो' ब्लॉग की चर्चा

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पता नहीं कहीं पढ़ा था कि हर व्यक्ति के कमरे में एक ऐसी दराज होती हैं जहाँ उसकी एक डायरी होती है। इस डायरी में रोजमर्रा के अनुभव, सुख-दुःख, आशा-निराशा, आकांक्षा-महत्वाकांक्षा होती हैं। इनमें वे छोटी छोटी बातें होती हैं जो जीवन को अपने ढंग से नए मायने देती है। इनमें कल्पना की उडा़न होती है तो कहीं भावनाओं की लहरें भी हिलोर लेतीं बहती रहती हैं। रिश्ते-नातों से लेकर दुनिया जहान की बातें होती हैं जो उस व्यक्ति को कहीं न कहीं, किसी न किसी स्तर पर प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि दुनिया के महान लेखकों से लेकर आम आदमी ने डायरी में अपने रोजमर्रा के अनुभवों को दर्ज किया है।

विज्ञापन जगत में कॉपी एडिटर हैं। उनकी भी एक पुरानी डायरी है। कॉपी के पुराने पन्ने हैं। इसमें वे अपने अहसासों को शब्दों में पिरोने की कोशिश करती हैं। यह कोशिश कई सालों से जारी है और अभी भी चल रही है। उनकी इन डायरी और कॉपी के पन्ने पढ़ो तो इसमें से पुराने दिनों की खुशबू महसूस होती है। वे गुलजार, और बशीर बद्र को पसंद करती हैं। पूजा की कविताएँ, गज़लें और नज्में पढ़ो तो लगता है उन्हें शब्दों से खेलना अच्छा लगता है। वे कहती भी हैं कि शब्द जिंदगीभर के मेरे साथी हैं। वे फिल्मे बनाना चाहती हैं, किताब लिखना चाहती हैं और अपनी जिंदगी के हर पल को अपनी तरह से जीना चाहती हैं।

उनकी हजारों ख्वाहिशें हैं उनके तुम जो मेरे हो को पढ़कर यह अहसास आसानी से होता है कि वे अपनी हजारों ख्वाहिशों को बिना लाग लपेट के भावुकता के साथ कह जाना चाहती हैं। इसमें बात को कहने की एक सरल-सहज कोशिश है। किसी को मोहित करने और प्रभावित करने की कोशिश नहीं बल्कि ख्वाहिशों को अभिव्यक्त करने की बेचैनी महसूस की जा सकती है।

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अपनी कोई कविता या गज़ल पढ़वाने के पहले वे यह सादा बात कहती हैं कि लड़कपन तो नहीं कह सकते लेकिन स्कूल के आखिरी सालों(12th) में हमेशा कॉपी के आखिरी पन्नों पर केमिस्ट्री के फार्मूला और फिजिक्स के थेओरेम के अलावा ये कुछ खुराफातें मिली रहती थी। माँ हमेशा इन्हें कचरा कहती थी, कोई कॉपी उलट के देखेगा तो क्या कहेगा। पर हम भी पत्थर थे, लिखते रहते थे।

आज मेरे पास एक कूड़ेदान के जैसी दिखने वाली फाइल है, जिसमें सारे पन्ने फटे हुए रखे हैं। जब इनको खोलती हूँ तो लगता है एक दशक पीछे पहुँच गई हूँ...। जाहिर है वे बीत चुके जीवन के उन लम्हों को याद करती हैं और दर्ज करती हैं जिसने उन लम्हों को कुछ खास मायने दिए। उदाहरण के लिए वे अपनी एक गजल पेश करती हैं। मिसाल के तौर पर एक छोटी सी लेकिन मार्मिक बानगी देखिए-

जिस्म के परदे हटा कर रूह तक झाँक लेती हैं
रवींद्र व्यास|
मुहब्बत करने वालों की अजीब निगाहें होती है



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