सउदी अरब की ढोल की पोल

Author राम यादव| पुनः संशोधित मंगलवार, 5 जनवरी 2016 (13:52 IST)
अमेरिका की जगह सऊदी अरब अब वह स्वयं मध्यपूर्व की निर्णायक शक्ति बनना चाहता है। सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को हटाने के उसके अभियान और यमन में ईरान समर्थक हूती विद्रोहियों के विरुद्ध उसके सैनिक हस्तक्षेप को जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी इसी परिप्रेक्ष्य में देखती है। 46 अन्य लोगों के साथ सऊदी शियाओं के सबसे बड़े धर्मगुरू निम्र अल निम्र को भी फांसी दे कर अब उसने अपने प्रतिद्वंद्वी ईरान को पूरी तरह लकार दिया है।
दिसंबर के पहले सप्ताह से बर्लिन के सउदी दूतावास का हाल बेहाल है। हुआ यह कि नए शाह सलमान बिन अब्द अल- अज़ीज़ के 30 वर्षीय शहजादे युवराज मोहम्मद बिन सलमान अल- सउद ने राजदूत महोदय को एक दिन फ़ोन कर खूब डांट पिलाई। आदेश दिया कि जर्मनी के अख़बारों में  विज्ञापन देकर उनकी और की छवि को निखारा जाए।
 
इस डांट-डपट के तुरंत बाद सउदी दूतावास ने एक विज्ञापन एजेंसी को जर्मनी के प्रमुख अखबारों में पूरे पृष्ठ के विज्ञापन छपवाने का ठेका दिया। अकेले जर्मनी के सबसे प्रतिष्ठित दैनिक 'फ्रांकफुर्टर अल्गेमाइने त्साइटुंग' में छपे विज्ञापन के लिए दूतावास ने 66 हजार यूरो (1 यूरो लगभग 72 रुपए) अदा किए। आनन-फ़ानन में छपवाए गए इन विज्ञापनों की जर्मन भाषा भी कई बार शब्दशः किए गए नीरस अनुवादों की शिकार बनी।
 
इन विज्ञापनों में राजशाही सउदी अरब की छवि एक ऐसे आधुनिक देश के रूप में पेश की गई है, जो पूरे दृढ़ संकल्प के साथ हर तरह के से लड़ रहा है और जो दुनिया भर के निवेशकों का चहेता गंतव्य बन गया है। युवराज मोहम्मद बिन सलमान अपने देश के रक्षामंत्री भी हैं।
 
जर्मन अखबारों में एक मंहगा विज्ञापन-अभियान छेड़ने की जरूरत उन्हें इसलिए पड़ गई, क्योंकि जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी ने सउदी अरब की रीति-नीति के बारे में अपना एक विश्लेषण जर्मनी के कुछ चुने हुए पत्रकारों को उपलब्ध करा दिया था। दो दिसंबर के दिन सारे मीडिया में इस विश्लेषण की धूम रही। स्वयं जर्मन सरकार भी सकते में आ गई।
 
सउदी विदेशनीति बन रही है आक्रामक : अपने विश्लेषण में जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी ने आगाह किया है कि सउदी अरब के विदेशनीतिक प्रतिमान तेज़ी से बदल रहे हैं। उसकी विदेशनीति 'आक्रामक' और 'हस्तक्षेपकारी' रूप धारण करती जा रही है।
 
रक्षामंत्री होने के साथ-साथ विदेशनीतिक और अर्थनितिक सत्ता भी जिस तरह युवराज मोहम्मद बिन सलमान के हाथों में केंद्रित होती जा रही है, 'उसमें यह खतरा छिपा हुआ है कि वे अपने पिता के रहते सिंहासन पर बैठने के अपने उत्ताराधिकार को पुख्ता करने के फेर में मर्यादाओं का अतिक्रमण कर बैठेंगे।'
 
विदेशनीतिक मामलों में बाहर से 'हस्तक्षेप करने की जो आवेशी प्रवृत्ति' दिखाई पड़ने लगी है, उसके पीछे युवराज मोहम्मद बिन सलमान का ही हाथ होना चाहिए। वे देश के भीतर अपनी पकड़ को मज़बूत करने के फेर में 'अपू्र्व सैनिक, वित्तीय और राजनीतिक जोखिम उठाने के लिए तत्पर प्रतीत होते हैं।'
 
सऊदी युवराज की महत्वाकांक्षाएं : सउदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान इस कारण और भी लाल-पीले हो रहे थे कि वे ही जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा के इस विश्लेषण के खलनायक हैं। विश्लेषण में आगे कहा गया है कि अपने पिता की तरह 'वे भी अरब जगत के मुखिया के तौर पर नाम कमाना चाहते हैं।'
 
उनका समझना है कि उनके देश को वर्षों से वह मान-सम्मान नहीं मिल रहा है, जो मिलना चाहिए। इस अनुभूति को एक विदेशनीतिक एजेंडा बनाते हुए वे सउदी अरब के दबदबे को 'एक शक्तिशाली सैन्यपक्ष और नए क्षेत्रीय गठबंधनों द्वारा बढ़ाना चाहते हैं।'
 
इसीलिए सउदी अरब सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद को हटाने पर तुला है, ताकि वहां ईरान और उसके सहयोगी हिज्बोल्ला का पत्ता साफ हो सके और सउदी अरब अपने आप को एक 'क्षेत्रीय सुन्नी शक्ति' के रूप में स्थापित कर सके।
 
बीएनडी का यह भी कहना है कि क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए ईरान के साथ सउदी अरब की होड़ के पीछे मुख्य कारण अमेरिका पर से उसका यह विश्वास उठते जाना है कि वह (अमेरिका) आगे भी मध्यपूर्व में सैनिक सुरक्षा देने और कानून- व्यवस्था बनाए रखने वाली दीर्घकालिक शक्ति बना रहेगा। अमेरिका की भावी भूमिका के प्रति सउदी विश्वास जितना घटेगा, ईरान के साथ 'पारस्परिक अविश्वास और धार्मिक-सैद्धांतिक शत्रुता-भाव उतना ही बढ़ेगा।'
 
यमन में अपने सैनिक हस्तक्षेप द्वारा सउदी अरब यही सिद्ध करने में लगा है कि वह हर तरह के 'सैनिक, वित्तीय एवंम राजनैतिक जोखिम उठाने को तैयार है, ताकि क्षेत्रीय राजनीति के दांव-पेंच में कहीं पिछड़ न जाए।'
 
युवराज को जोखिम उठाने का चस्का : जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा का समझना है कि मात्र 30 साल के युवराज मोहम्मद बिन सलमान को ही जोखिम उठाने का सबसे अधिक चस्का है। अपने विश्लेषण में उसने लिखा है, 'शाही परिवार के बड़े-बूढ़े नेतृत्वकारी सदस्यों के अब तक के सावधानीपूर्ण कूटनीतिक रुख की जगह अब एक आवेशपूर्ण हस्तक्षेपकारी नीति लेती जा रही है।' स्मरणीय है कि युवराज मोहम्मद बिन सलमान जनवरी 2015 से सउदी अरब के रक्षामंत्री हैं। उनके पिता शाह सलमान बिन अब्द अल- अजीज भी अपने सौतेले भाई शाह अब्दुल्ला इब्न अब्द अल- अजीज की मत्यु के बाद जनवरी में ही सत्तासीन हुए थे।
 
पिता को राजसिंहासन मिलने और मोहम्मद बिन सलमान को उनका उत्तराधिकारी एवंम देश का नया रक्षामंत्री बनाए जाने के तीन ही महीनों के भीतर, 26 मार्च 2015 से, सउदी अरब ने यमन के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप करते हुए वहां के शिया संप्रदाय के हूथी विद्रोहिया के विरुद्ध बमबारी शुरू करदी, जो आज भी चल रही है। इस बीच नौ और अरब देश इस अभियान में शामिल हो गए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस भी किसी न किसी रूप में सउदी अरब का साथ दे रहे हैं। यही कारण है कि यूक्रेन में रूस के कथित हस्तक्षेप को लेकर रूस का आर्थिक बहिष्कार कर रहे पश्चिमी देश और उनके मीडिया यमन में सउदी हस्तक्षेप पर शोर नहीं मचाते।
 
युवराज मोहम्मद बिन सलमान जितने महत्वाकांक्षी हैं, उतने ही बड़बोले भी हैं। दिसंबर के मध्य में उन्होंने सउदी अरब के घरेलू प्रेस-प्रतिनिधियों को अकस्मात बुला कर बड़े ताव से घोषित किया कि अपने आप को 'इस्लामी खलीफत' कहने वाले 'आईएस' (इस्लामी स्टेट) की अब खैर नहीं: 'केवल इस्लामी स्टेट की ही नहीं, ऐसे हर आतंकवादी संगठन की अब खैरियत नहीं है, जो हमारे सामने पड़ेगा।' आतंकवाद-विरोधी गठबंधन : अपने देश के रक्षामंत्री के तौर पर इस पत्रकार सम्मेलन में उन्होंने यह दावा भी किया कि 'इस्लामी जगत को भारी नुकसान पहुंचा रही आतंकवाद नाम की बीमारी का उन्मूलन कर देने के विचार से' साउदी अरब के नेतृत्व में 34 देशों का एक आतंकवाद-विरोधी गठबंधन बना है।
 
गठबंधन के बारे में और विवरण देने के नाम पर उन्होंने केवल इतना ही बताया कि सउदी अरब की राजधानी रियाद उसका मुख्यालय होगा। ऐसे सभी देश स्वेच्छा से उसमें शामिल हो सकते हैं, जो उसकी सैन्यक्षमता बढ़ाने में सहयोग देना चाहते हैं और यह कि यह गठबंधन किसी देश की सहमति के बिना उसके यहां कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
 
पश्चिमी देशों को आतंकवाद-विरोधी 'इस्लामी गठबंधन' बनने की इस घोषणा से बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उनकी गुप्तचर सेवाओं को ऐसी कोई भनक तक नहीं मिली थी। गठबंधन के सदस्य देशों की 16 दिसंबर को प्रकाशित सूची के अनुसार, सउदी अरब के अलावा उसके बाक़ी 33 सदस्य देश हैं बहरीन, क़तर, जॉर्डन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, फिलस्तीन, लेबनान, लीबिया, ट्यूनीसिया, मिस्र, मोरक्को, मौरितानिया, तुर्की, टोगो, चाड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, बेनीन, जिबूती, सेनेगाल, सूडान, सिएरा लिओन, सोमालिया, गबून, गिनी, कोमोर द्वीप, आइवरी कोस्ट, मालदीव, माली, मलेशिया, नाइजर और नाइजीरिया।
 
कई देश गठबंधन से बाहर : अधिकतर देश मुस्लिम बहुसंख्यक हैं किंतु अफ्रीका के बेनीन, गबून, आइवरी कोस्ट और टोगो में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस सूची में संसार में सबसे अधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इंडोनेशिया, शिया मुसलमानों की प्रधानता वाले ईरान, इराक़, पाकिस्तान के पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान, खाड़ी क्षेत्र के अरब देश ओमान और उत्तरी अफ्रीका के प्रमुख अरब देश अल्जीरिया का नाम नहीं है।
 
प्रश्न यह भी पूछा जा रहा है कि सउदी अरब आतंकवाद को यदि सचमुच एक बीमारी मानता है, तो पहली बात, शुरू-शुरू में उसने उसे पाला-पोसा ही क्यों? दूसरी बात, यदि इस बीमारी का अंत करने के प्रति वह वाकई ईमानदार है, तो यही ईमानदारी उसने अमेरिका के नेतृत्व में दो साल पहले आईएस पर बमबारी करने के लिए बने गठबंधन में रह कर क्यों नहीं दिखाई? उससे वह चुपके-चुपके इस तरह बाहर क्यों खिसक गया कि अब 90 प्रतिशत बमबारी अकेले अमेरिका और बाक़ी 10 प्रतिशत ब्रिटेन, फ्रांस और जॉर्डन कर रहे हैं? और तीसरी बात, ईरान और इराक क्या इस्लामी देश नहीं हैं कि ''इस्लामी गठबंधन'' में उन्हें जगह नहीं मिली?
 
उल्लेखनीय है कि इस्लामी आतंकवाद से लड़ने के नाम पर ऐसा ही एक सैनिक गठबंधन मार्च 2015 में मिस्र के सैलानी नगर शर्म अल शेख में भी बना था। उसके जन्मदाता थे मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फ़तह अल- सीसी। उसे एक अखिल अरबी सैनिक गठबंधन बताया जा रहा था। सउदी अरब भी उसमें शामिल था। लेकिन,  उसमें शामिल देशों के सेना-प्रमुखों के बीच मतभेद दो-तीन बैठकों में ही इतने तेज़ हो गए कि उसे सितंबर में दफ़ना देना पड़ा।
 
गठबंधन की ढोल का पोल : सउदी युवराज ने 16 दिसंबर को जिस नए इस्लामी गठबंधन का ढोल पीटा, उसका पोल भी यही है कि उसमें शामिल बताए जा रहे कई देशों ने या तो अपनी औपचारिक सहमति नहीं जताई है या आधे मन से सहमत हुए हैं।
 
जानकारों का कहना है कि सउदी युवराज के पत्रकार सम्मेलन के 48 घंटे बाद ही आतंकवाद से लड़ने चले उनके 'इस्लामी गठबंधन' की बहुत-सी गांठें खुल चुकी थीं।
 
पाकिस्तान, मलेशिया और लेबनान ने अपने हाथ खींच लिए। पाकिस्तान के विदेशमंत्री ने कहा कि उन्हें इस गठबंधन में पाकिस्तान के शामिल होने का पता ही मीडिया से चला।> > इंडोनेशिया ने यह कह कर पहले ही मना कर दिया था कि वह किसी सैनिक परियोजना में अपना नाम नहीं देखना चाहता। चाड और माली भी डगमगाने लगे थे। मिस्र की सहमति उसे अरबों डॉलर की सहयता का आश्वासन देकर खरीदी गई थी और बहुत संभव है कि कई दूसरे देशों को भी इसी तरह ललचाया गया हो। वे भी तब अपने नाम वापस खींचने की सोच सकते हैं, जब उन्हें लगेगा उनका उल्लू सीधा नहीं हो रहा है।
 
अरब शासकों का बड़बोलापन : कह सकते हैं कि 30 साल के राजनीतिक नोसुखुआ सउदी युवराज का दांव इसलिए नहीं चल पाया कि वे जितने महत्वाकांक्षी हैं, उतने अनुभवी नहीं हैं। एक तीर से दो शिकार करने चले थे। आतंकवाद का पोषक कहलाने वाले सउदी अरब की छवि सुधारना और लगे हाथ स्वदेश में अपनी योग्यता का इस तरह सिक्का जमाना चाहते थे कि पिता के बाद गद्दी उन्हीं को मिले। मध्यपूर्व के जानकार प्रेक्षकों का यह भी कहना है कि सहयोग-भाव और सहिष्णुता के अभाव में बड़बोलापन वहां के स्वेच्छाचारी शासकों का सहज स्वभाव बन गया है। वे समझते हैं कि शुरू में ही इतना ढोल पीट दो कि बाद में लोग शोर और संगीत के बीच अंतर ही न कर पाएं।
 
जो भी हो, आईएस जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों से लड़ने के लिए अरब-इस्लामी देशों का एक साथ खड़े होने के बदले आपस में ही उलझना एक बार फिर यही दिखाता है कि वे इस्लामी आतंकवाद को अब भी गंभीरता से नहीं लेते। इस आतंकवाद के कारण स्वयं अरब-इस्लामी देशों में लाखों के मरने और दसियों लाख के भाग कर दूसरे देशों में शरण लेने से भी उनकी अंतरात्मा उन्हें कचोट नहीं रही है। वे अब भी कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं।
 
युवराज और रक्षामंत्री : अमेरिका की जगह सऊदी अरब अब वह स्वयं मध्यपूर्व की निर्णायक शक्ति बनना चाहता है। सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को हटाने के उसके अभियान और यमन में ईरान समर्थक हूती विद्रोहियों के विरुद्ध उसके सैनिक हस्तक्षेप को जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी इसी परिप्रेक्ष्य में देखती है। 46 अन्य लोगों के साथ सऊदी शियाओं के सबसे बड़े धर्मगुरू निम्र अल निम्र को भी फांसी दे कर अब उसने अपने प्रतिद्वंद्वी ईरान को पूरी तरह लकार दिया है।



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