अब गठबंधन की राजनीति से भी छुटकारा पाना चाहती है भाजपा!

Author अनिल जैन| Last Updated: गुरुवार, 7 जनवरी 2021 (16:58 IST)
हाल ही में ब्रिटेन की मशहूर पत्रिका 'द इकॉनॉमिस्ट' ने लिखा है कि भारत एक पार्टी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है। भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति भी इसी बात की पुष्टि कर रही है। अभी तक कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के विधायकों-सांसदों को तोड़कर अपने पाले में ला रही भाजपा ने अब यही खेल अपने सहयोगी दलों के साथ भी खेलना शुरू कर दिया है। इस सिलसिले में अरुणाचल प्रदेश का राजनीतिक घटनाक्रम सबसे ताजी और बड़ी मिसाल है। वहां उसने अपने ही सबसे बड़े और करीब 2 दशक पुराने सहयोगी जनता दल (यू) के 7 में से 6 विधायकों को तोड़कर अपने में शामिल कर लिया है।
अरुणाचल प्रदेश का यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भाजपा का राजनीतिक अभियान अब सिर्फ 'विपक्ष-मुक्त भारत' तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। अब उसने 'विपक्ष-मुक्त भारत' के साथ-साथ अपने को गठबंधन की राजनीति से मुक्त करने का अभियान भी शुरू कर दिया है। यह इस बात का भी संकेत है कि जिस राज्य में उसने मजबूती से अपने पैर जमा लिए है, वहां अब वह अपने सहयोगी दलों के वजूद को भी खत्म करने का इरादा रखती है।
हालांकि भारत में गठबंधन की राजनीति शुरू करने का श्रेय 3 दशक पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में गठित जनता दल को जाता है। उसने दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाया था। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार भी बनी लेकिन ज्यादा दिन नहीं चली। बाद में 1996 में संयुक्त मोर्चा बना और उसकी भी सरकार बनी, लेकिन वह भी टिकाऊ नहीं रही।

लेकिन भाजपा को गठबंधन की राजनीति का चैंपियन माना जाता रहा है। खुद भाजपा ने भी कई मौकों पर अपने सहयोगी दलों के प्रति उदारता बरतते हुए इस बात को साबित भी किया है। कई मौकों पर उसने अपने सहयोगियों को गठबंधन धर्म निभाने की नसीहत भी दी है। गठबंधन की राजनीति के बूते ही उसने करीब 2 दशक पहले भी अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। उस समय उसकी अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का निर्माण हुआ था।
1998 में करीब 25 छोटे-बड़े दलों का बना वह गठबंधन राष्ट्रीय राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा गठबंधन था। 2004 के आम चुनाव में सत्ता से अलग हो जाने के बाद कई दलों ने अलग-अलग वजहों से इस गठबंधन से नाता तोड़ लिया। इसके बावजूद इसी गठबंधन के सहारे भाजपा ने 2014 में पूर्ण बहुमत हासिल किया और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनाई।

उसने 2019 का चुनाव भी इसी गठबंधन का नेतृत्व करते हुए लड़ा। इस चुनाव में उसे अकेले ही जिस तरह की भारी-भरकम जीत मिली जिसके चलते साफ दिख रहा है कि उसका अपने सहयोगी दलों के प्रति नजरिया बदल गया है। उसे लग रहा है कि अब उसे देश में कहीं भी किसी सहयोगी की जरुरत नहीं रह गई है।ऐउसके इस इरादे की झलक अरुणाचल के राजनीतिक घटनाक्रम में देखी जा सकती है।
भाजपा का लक्ष्य किसी भी कीमत पर हर राज्य में अपनी सरकार बनाना है। इसलिए अरुणाचल का घटनाक्रम इस बात का भी संकेत है कि बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में चौंकाने वाली घटनाओं के साथ बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

अरुणाचल में भाजपा की सरकार को 2 तिहाई बहुमत पहले से ही हासिल था। जनता दल (यू) का भी समर्थन उसे हासिल था। ऐसे में उसे किसी अन्य पार्टी के विधायकों को तोड़ने की कतई जरुरत नहीं थी, लेकिन फिर भी उसने अपने ही सहयोगी दल के विधायकों से दलबदल कराया है तो इसका मतलब साफ है कि उसे अब जनता दल (यू) की राजी-नाराजी की कोई परवाह नहीं है।
उसे इस बात की भी परवाह नहीं है कि उसका यह पुराना और सबसे बड़ा सहयोगी एनडीए का हिस्सा बना रहता है या नहीं। इसलिए अगर आने वाले दिनों में वह बिहार में भी पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' करते हुए उनकी पार्टी के विधायकों को बड़ी संख्या में तोड़ती है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। वहां कांग्रेस के भी कुछ विधायकों के भाजपा नेताओं के संपर्क में होने की खबरें आई हैं।
दरअसल, समूचे उत्तर भारत में बिहार ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां भाजपा सत्ता में भागीदार तो कई बार रही है और आज भी है लेकिन वह अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है। हालांकि वहां हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा पहली बार अपने गठबंधन यानी एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। लेकिन इसके बावजूद सूबे के सामाजिक समीकरणों को पूरी तरह अपने पक्ष में करने के मकसद से उसे नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करना पड़ा है जिनकी पार्टी का प्रदर्शन इस बार बेहद खराब रहा है।
दरअसल बिहार में जनता दल (यू) और भाजपा के रिश्तों में खटास विधानसभा चुनाव के दौरान ही आ गई थी, जब चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। उन्होंने अकेले चुनाव लड़ा भी लेकिन सिर्फ जनता दल (यू) के कोटे की सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए। चुनाव प्रचार के दौरान भी चिराग पासवान पूरे समय नीतीश कुमार पर ही गंभीर आरोपों के साथ निशाना साधते रहे और साथ ही खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान भी बताते रहे। चिराग के इस पैंतरे को भी भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा माना गया। खुद नीतीश कुमार भी ऐसा ही महसूस कर रहे थे। लेकिन उनके सामने इसे बर्दाश्त करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। जो भी हो, करीब 30 सीटों पर लोक जनशक्ति पार्टी की वजह से जनता दल (यू) को हार का सामना करना पड़ा। इसी नुकसान की वजह से ही वह भाजपा से काफी पिछड़ गई।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अरुणाचल में भाजपा की ओर से मिले इस झटके का सामना बिहार में नीतीश कुमार किस तरह करते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी पार्टी के विधायकों को एकजूट रखना और अपनी पार्टी को भाजपा की ओर से हो सकने वाली तोड़फोड़ की कार्रवाई से बचाना। यह चुनौती आसान नहीं है। फिलहाल उन्होंने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए अपनी पार्टी की कमान अपने विश्वस्त समझे जाने वाले सांसद आरसीपी सिंह को सौंप दी है।
आरसीपी सिंह राजनीति में आने से पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी थे। वशिष्ठ नारायण सिंह और केसी त्यागी जैसे नेताओं की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने का मुख्य आधार उनका नीतीश कुमार का सजातीय यानी कुर्मी होना है। नीतीश कुमार भले ही उन्हें अपना विश्वस्त मानते हो, लेकिन हकीकत यह है कि आरसीपी सिंह भाजपा नेतृत्व के भी काफी करीबी हैं। उनके सहित जनता दल (यू) के कई सांसद केंद्र में मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। इसलिए माना जा रहा है कि आरसीपी सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद जनता दल (यू) को तोड़ना अथवा पूरा हजम कर जाना भाजपा के लिए अब और आसान हो जाएगा।
भाजपा अगर बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए वहां भी अरुणाचल का किस्सा दोहराती है तो उसे जनता दल (यू) के 43 में से कम से कम 29 और कांग्रेस के 19 में से 13 विधायकों को तोड़ना होगा। ऐसा करने में अगर वह सफल रहती है तो उसके लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा। हालांकि जनता दल (यू) के महासचिव और प्रवक्ता केसी त्यागी ने अरुणाचल के घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है और साथ ही बिहार की राजनीति पर इसका असर पड़ने की संभावना से इंकार किया है। लेकिन उनकी यह उम्मीद कितनी भोली और बेचारगी भरी है, इसे नरेंद्र मोदी और के अंदाज-ए-सियासत को देखते हुए आसानी से समझा जा सकता है।
पिछले छह साल के दौरान नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति के बूते जिस तेजी से भाजपा का विस्तार हुआ है, वह चौंकाने वाला है। देश के कई राज्यों में उसने अपनी सरकार बनाई है। जिन राज्यों में उसे जनता ने नकार दिया, वहां भी उसने विधायकों की खरीद-फरोख्त और जोड़-तोड़ से सरकार बनाई है। पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में जहां कभी उसका कोई नाम लेने वाला भी नहीं होता था, वहां भी वह सरकार बनाने के जमीन-आसमान एक किए हुए है।
भाजपा अपनी जिस हिकमत अमली से किसी राज्य में बहुमत न होते हुए भी सरकार बना लेती है, उसको मीडिया का एक बड़ा हिस्सा चीयर लीडर्स के अंदाज में बड़े मुग्धभाव से 'मास्टर स्ट्रोक' करार देता है। इसी 'मास्टर स्ट्रोक' के सहारे भाजपा ने एक बार पहले भी अरुणाचल में सरकार बनाई थी। बाद में गोवा, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में भी उसने ऐसा ही किया था।

भाजपा की ओर से विपक्षी दलों से दलबदल कराने का सबसे बड़ा खेल एक साल पहले मध्य प्रदेश में खेला गया था। वहां उसने एक झटके में कांग्रेस के 22 विधायकों तोड़कर कांग्रेस की सरकार गिराई थी। इससे पहले इसी तर्ज पर ही उसने कर्नाटक में भी जनता दल (एस) और कांग्रेस की साझा सरकार गिरा कर अपनी सरकार बनाई। यही खेल कुछ समय पहले उसने राजस्थान में भी खेलने की कोशिश की थी। हालांकि वहां उसे कामयाबी नहीं मिली, लेकिन उसने अपनी कोशिशें जारी रखी हुई हैं। राजस्थान के भाजपा नेता खुलेआम कह रहे हैं कि अगले 2-3 महीने में कांग्रेस की सरकार गिर जाएगी। ऐसा ही दावा महाराष्ट्र में भी भाजपा के नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों की ओर से किया जा रहा है, जहां सत्ता पर कब्जे की लड़ाई में शिव सेना जैसी उसकी सबसे पुरानी और विश्वस्त सहयोगी पार्टी ने भी उससे नाता तोड़ लिया।
गुजरात में भी पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से भाजपा ने कांग्रेस के कई विधायकों को तोड़कर अपने साधारण बहुमत को आरामदायक बहुमत में बदला है। भाजपा का इरादा अब पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का है, जहां 4-5 महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। वहां वह तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और नेताओं को तोड़ने में लगी हुई है। झारखंड और हरियाणा में भी कांग्रेस के कई विधायकों को भाजपा में शामिल होने के प्रस्ताव दिए जा चुके हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती है।)



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