ये 25 'महामानव' जिन्होंने बनाया भारत को

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
कनिष्क(115-147 ई॰ लगभग) : बौद्ध सम्राटों में अशोक के बाद कनिष्क का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वह बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयायी था और उसने बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार किया। विम के पश्चात कनिष्क सिंहासन पर बैठा था। कषिष्क कुषाणवंशी था। कुषाण कौन थे इस पर मतभेद हैं। हिन्दू कहते हैं कि यह कुष्मांडा जाति के थे जो शैव धर्म को मानते थे। दूसरी ओर अंग्रेज इतिहासकार इन्हें मध्य एशिया का मानते हैं।
 
कनिष्क का राज्य मध्य एशिया से लेकर भारत के पूर्वी भाग तक था। उसके शासन के अंतर्गत तुर्किस्तान (तुर्की), काशगर, यारकंद, खोतन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर, मथुरामंडल, बिहार आदि क्षेत्र आते थे। उत्तर में पेशावर (पुरुषपुर) को इसने अपने राज्य की राजधानी बनाया था। मध्य में मथुरा तथा पूर्व में सारनाथ उसके राज्य के मुख्य केन्द्र थे। खोतनी साहित्य तथा चीनी साहित्य में कनिष्क की अनेक विजय यात्राओं का उल्लेख मिलता है।
 
कनिष्क के दरबार में वसुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन, पार्श्व, चरक, संघरक्ष, और माठर जैसे विख्यात विद्धानों के अतिरिक्त अनेक कवि और कलाकार भी थे। अश्वघोष ने 'बुद्धचरित्र' तथा 'सौन्दरनन्द', शारिपुत्रकरण एवं सूत्रालंकार की रचना की। उनकी इस रचता की तुलना मिल्टन, गेटे, काण्ट एवं वॉल्टेयर से की जाती है जबकि होना उल्टा चाहिए।
 
कनिष्क ने सैकड़ों बौद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया था। पेशावर और तक्षशिला की तरह कनिष्क ने मथुरा में भी अनेक बौद्ध स्तूपों और मठों का निर्माण करवाया था। कनिष्क के काल में हिन्दू और जैन धर्म की उन्नती भी हुई। कनिष्क ने अपने शासन के अंतर्गत सभी धर्मावलंबियों को स्वतंत्रता प्रदान कर रखी थी।
 
कनिष्क के पश्चात्य उसका पुत्र वासिष्क (102 -106 ई॰) और पौत्र हुविष्क(सं.163.-सं.195) ने शासन किया। परवर्ती कुषाणों को हूणों से तथा उनके पश्चात मुसलमानों से लड़ना पड़ा और अंतत: वे अपनी सत्ता और अपना अस्तित्व खो बैठे।
 
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