ये 25 'महामानव' जिन्होंने बनाया भारत को

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
शक सम्राट रुद्रदामन : यूं तो शक राजाओं में कई प्रतापी राजा हुए लेकिन उनका कम ही उलेख मिलता है। शकों के काल में मथुरा और उज्जैन भारत की सत्ता के केंद्र में थे इसीलिए शकों ने उज्जैन पर आक्रमण कर उसे अपने अधिन कर लिया। 
 
रुद्रदामन उज्जैन के सिंहास बैठा जो 'कार्दमकवंशी' चष्टन का पौत्र था। रुद्रदामन इस वंश का सर्वाधिक योग्य शासक था और इसका शासन काल 130 से 150 ई. माना जाता है। रुद्रदामन एक अच्छा प्रजापालक, तर्कशास्त्र का विद्वान तथा संगीत का प्रेमी था। इसके समय में उज्जयिनी शिक्षा, कला और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन गई थी।
 
कहते हैं कि कुषाणों की तरह शक भी मध्य एशिया से निकाले जाने पर काबुल-कंधार की ओर होते हुए उज्जैन तक आ पहुंचे और यहां राज्य किया। महाभारत, पुराण, रामायण आदि सभी में शक या शाक्यों का उल्लेख मिलता है।
 
एक अनुश्रुति अनुसार उज्जैन के जैनाचार्य कालक का उज्जैन के राजा गर्दभिल्ल से विवाद था जिसके चलते वे पश्चिम के पार्थियन राज्य में चले गए थे जहां राजा मिथिदातस द्वितीय के अत्याचारों से परेशान शक लोगों के मुखियां को उन्होंने भारत आने के लिए प्रेरित किया।
 
कालक के साथ शक लोग पहले सिन्ध में प्रविष्ट हुए, और वहां पर उन्होंने अपना राज्य स्थापित कर लिया। फिर वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए। बाद में सौराष्ट्र को जीतकर उन्होंने उज्जयिनी पर भी आक्रमण कर वहां के राज्या गर्दभिल्ल को परास्त किया। शकों की मुख्य राजधानी मीननगर थी। बाद में उन्होंने लगभग ई.पू. 100 में मथुरा को अपना केंद्र बना लिया था। उनके शासन के अंतर्गत गांधार, सिंध, महाराष्ट्र, मथुरा और मालवा था। इस कुल में कई प्रातापी राजा हुए लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा नहपान, चष्टक और रुद्रदामन की होती है।
 
नहपान का शासनकाल सम्भवतः 119 से 224 तक रहा। कुछ लोग नहपान को ही शक संवत का प्रवर्तक मानते हैं। दूसरी ओर उज्जयिनी का पहला स्वतंत्र शक शासक चष्टण था। इसने अपने अभिलेखों में शक संवत का प्रयोग किया था। इसके अनुसार इस वंश का राज्य 130 ई. से 388 ई. तक चला। उज्जैन के क्षत्रपों में सबसे प्रसिद्ध रुद्रदामा (130 ई. से 150 ई.) था।
 
चौथी शताब्दी ई. के अन्त में समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय (शासन: 380-412 ईसवी) ने इस वंश के अन्तिम रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शकों के क्षेत्रों को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। चन्द्रगुप्त द्वितीय भी शाकारि विक्रमादित्य की उपाधि से अलंकृत था।
 
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