ये 25 'महामानव' जिन्होंने बनाया भारत को

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
राजेन्द्र प्रथम (1012-1044 ई.) : जब उत्तर भारत में मेहबूत गजनबी मंदिरों को लूटकर ध्वस्त कर रहा था तब चोल राजवंश के महान राजा राजराजा चोल का पुत्र राजेंद्र चोल गद्दी पर बैठा था। राजेंद्र चोल को भी राजाओं का राजा अर्थात राजराजा कहा जाता था। कहते हैं कि राजेन्द्र की दस लाख से अधिक थलसेना और उन्नत नौसेना (जो दक्षिणी चीन सागर तक जा पहुंची थी) का सामना करने से बचने के लिए महमूद कभी दक्षिण भारत नहीं आया।
 
1014 से 1044 तक बंगाल की खाड़ी से लेकर इंडोनेशिया समेत पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया तक एकक्षत्र राज करने वाले राजेन्द्र चोल के इतिहास को उत्तर भारत में नहीं पढ़ाया जाता। वामपंथियों और अंग्रेजों ने भारत का इतिहास उत्तर भारत को केंद्र में रखकर ही लिखा और उन्होंने आक्रमणकारिकयों और लूटेरों में ही महानता की बातें खोजी।
 
चोल साम्राज्य के काल में भव्य मंदिरों का निर्माण किया गया जिसमें सबसे बड़ा मंदिर तंजावुर का मंदिर है जिसे पेरियाकोइल यानि की बड़ा मंदिर कहते हैं। यह मंदिर चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने बनवाया था जो लगभग 10 वर्ष में बनकर तैयार हुआ था। राजेंद्र चोल का नाम अरुण मोल्य वर्मन था। चोल साम्राज्य 9वीं सदी से 13वीं सदी तक कायम रहा। चोल सम्राज्य का दक्षिण भारत में राज्य रहा है। विजयनगर सम्राज्य के राजाओं की तरह इस वंश के राजा बड़े ही पराक्रमी और कला प्रेमी थे। 
 
तमिलनाडु के तंजावुर या तंजोर शहर का यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है, जो आज भी विद्यमान है। यह मंदिर राजराजा राजेंद्र चोल की शक्ति और सम्राज्य को बयां करता है। राज राजा राजेंद्र के समय दक्षिण भारत का केंद्र उनका शासन ही था। इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। यह मंदिर भगवान शिव का है।
 
कला के इतिहस में राज राजा का सबसे बड़ा योगदान रहा है। उनके द्वारा बनवाई गई ठोस कांसे में ढली भगवान शिव की 60 प्रतिमाएं इसका उदाहण है। राजा ने मंदिर में कुछ स्वर्ण मुकुट, अन्य सोने की वस्तुएं और चांदी की कई वस्तुएं दान दी थी जिसका उल्लेख मंदिर की ‍लेखों में मिलता है। कला एवं संस्कृति का उत्थान-साहित्य, कला, स्थापत्य कला, शिक्षा आदि के क्षेत्र में राजेन्द्र देव के समय उल्लेखनीय विकास हुआ। वैदिक संस्कृति की शिक्षा के लिये प्रत्येक कुर्रम में श्रेष्ठ गुरुकुल उस काल में स्थापित किये गये। इनमें संस्कृत और तमिल में शिक्षा दी जाती थी। उत्कृष्ट साहित्य की रचना भी इन दोनों भाषाओं में उस समय हुई। स्थापत्य, मूर्ति कला और मंदिरों के निर्माण के लिये यह भारत का स्वर्ण-युग था। श्रीरंगम्, मदुरा, कुंभकोणम्, रामेश्‍वरम आदि प्रसिद्ध स्थलों पर राजेन्द्र देव ने भव्य मंदिर बनवाये। ये आज भी हैं और स्थापत्य कला के अद्वितीय उदाहरण माने जाते हैं। इनकी दीवारों, गोपुर, गर्भगृह आदि में उकेरी गई मूर्तियाँ भारतीय मूर्ति-कला की उत्कृष्टता का बखान करती हैं। 
 
राजेंद्र चोल के पास लकड़ी के बने भव्य जहाज थे और वे समुद्री रास्ते से व्यापार करते थे। वे बंगाल की खाड़ी के पार जाकर व्यापार करते थे। पहले बंगाल की खाड़ी को चोल झील कहते थे। अरब और चीन से भी उनके व्यापार संबंध थे। इन्हीं जहाजों में जाकर वे दूसरे द्वीप राज्यों पर आक्रमण भी करते थे। अन्दमान-निकोबार द्वीपों और मालदीव पर भी चोल-नौसेना का अधिपत्य हो गया था। राजेन्द्र चोल की इस विजय के शिलालेख आज भी मलेशिया, इंदोनेशिया और सुमात्रा में मिलते हैं। सन् 1025 में उसके सैनिक बेड़े ने गंगा सागर पार कर यव-द्वीप (जावा) और सुवर्ण द्वीप(सुमात्रा) पर अधिकार कर लिया था।
 
राजेंद्र ने कई राज्यों पर आक्रमण करके अपने अधिन कर लिया था। राजेन्द्र प्रथम ने पाण्ड्य चेर देशों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने श्रीलंका पर भी पूर्ण विजय प्राप्त की और एक युद्ध में श्रीलंका के राजा और रानी के मुकुटों और राज चिह्नों को अपने अधिकार में ले लिया। अगले पचास वर्षों तक श्रीलंका चोल शासकों के नियंत्रण से मुक्त न हो सका।
 
राजेन्द्र प्रथम का एक प्रमुख अभियान वह था जिसमें वह कलिंग होता हुआ बंगाल पहुंचा जहां उसकी सेना ने दो नरेशों को पराजित किया। इस अभियान का नेतृत्व 1022 ई. में एक चोल सेनाध्यक्ष ने किया और उसने वही मार्ग अपनाया जो महान विजेता समुद्रगुप्त ने अपनाया था।
 
देखा जाये तो राजेन्द्र चोल की विजय-यात्राओं के सामने सिकन्दर तथा नेपोलियन के सैनिक अभियान भी बौने थे। राज राजेन्द्र चोल ने बीस वर्षों के यशस्वी शासन के बाद अपने पुत्र राजाधिराज को एक विस्तृत और शक्तिशाली साम्राज्य का दायित्व सौंपा। जेन्द्र चोल निस्संदेह रूप से विश्‍व के महान् विजेताओं में से था। लेकिन उसकी महानता उसके शौर्य, पराक्रम और सामर्थ्य में ही नहीं थी, उसने अनेक जन-कल्याणकारी कार्य भी किये। उसके शासन काल में पूरे दक्षिणापथ की जनता सुखी और समृद्ध थी। हालैण्ड के चार सौ साल प्राचीन लिडेन विश्‍वविद्यालय के म्यूजियम में राजेन्द्र देव के सुशासन और विजय यात्राओं के दस्तावेज शिला-लेखों के रूप में उपलब्ध हैं। राजाधिराज राजेन्द्र के आज्ञापत्र 21 ताम्र-पत्रों में मौजूद हैं जिनका भार तीस किलोग्राम है। ये आज्ञापत्र संस्कृत और तमिल में हैं।
 
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