ये 25 'महामानव' जिन्होंने बनाया भारत को

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
मिहिरभोज : गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामंत ने 725 ई. में की थी। उसने राम के भाई लक्ष्मण को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की शाखा सिद्ध किया। विद्वानों का मानना है कि इन गुर्जरों ने भारतवर्ष को लगभग 300 साल तक अरब-आक्रांताओं से सुरक्षित रखकर प्रतिहार (रक्षक) की भूमिका निभाई थी।
 
नागभट्ट प्रथम बड़ा वीर था। उसने सिंध की ओर से होने से अरबों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया, साथ ही दक्षिण के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के आक्रमणों का भी प्रतिरोध किया और अपनी स्वतंत्रता को कायम रखा। नागभट्ट के भतीजे का पुत्र वत्सराज इस वंश का प्रथम शासक था जिसने सम्राट की पदवी धारण की। वत्सराज के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा।
 
इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज प्रथम था, जो कि मिहिरभोज के नाम से भी जाना जाता है और जो नागभट्ट द्वितीय का पौत्र था। भोज प्रथम ने (लगभग 836-86 ई.) 50 वर्ष तक शासन किया और गुर्जर साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सतलुज तक हो गया। अरब व्यापारी सुलेमान इसी राजा भोज के समय में भारत आया था।
 
मिहिरभोज के बाद अगला सम्राट महेन्द्रपाल था, फिर महेन्द्र का पुत्र महिपाल बैठा। उसके बाद भोज द्वितीय, विनायकपाल, महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय और विजयपाल ने जैसे-तैसे 1019 ई. तक अपने राज्य को कायम रखा। महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था।
 
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कृष्ण द्वितीय : राष्ट्रकूट वंश के दो महाना शासक कृष्ण द्वितीय (978-915 ई.) और इन्द्र तृतीय (915-917 ई.) थे। दोनों के ही काल में महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में कला, संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा ही नहीं मिला बल्कि इनके शासन में आक्रमणकारियों से भी दक्षिण भारत सुरक्षित रहा। 
 
राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ 'दन्तिदुर्ग' से लगभग 736 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसके उपरान्त इन शासकों ने मान्यखेत, (आधुनिक मालखंड) को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने 736 ई. से 973 ई. तक राज्य किया। इनके शासन की राजथानी नासिक हुआ करती थी।
 
राष्ट्रकूटों के समय का सबसे विख्यात मंदिर एलोरा का कैलाश मंदिर है। इसका निर्माण कृष्ण प्रथम के शासनकाल में किया गया था।
 
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