हम अपनी भाषा से कब करेंगे प्यार?

पुनः संशोधित रविवार, 16 नवंबर 2014 (21:46 IST)
जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की मुलाकात में 'बनाम जर्मन' भाषा के मुद्दे ने हिंदुस्तान में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। 
संस्कृत भाषा को सभी भाषाओं की जननी माना जाता रहा है और जब से मोदी ने देश की बागडोर संभाली है, उससे यह तो आभास हो ही गया है कि वे हिन्दी  के साथ ही संस्कृत भाषा को कभी बच्चों से अलग नहीं होने देंगे।
 
लेकिन जब यह खबर चांसलर एंजेला मर्केल के कानों में पहुंची कि तीसरी भाषा के रूप में जर्मन भाषा को केंद्रीय विद्यालयों के स्कूलों से हटाया जा रहा है, तो वे बुरी तरह हिल गईं और मोदी से मुलाकात में उन्होंने भारत में जर्मन भाषा की पैरवी कर डाली। फिलहाल तो मोदी ने इस मुद्दे को यह कहकर टाल दिया है कि भारतीय प्रणाली के दायरे में इस पर क्या सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, इसे देखेंगे। 
 
छठी से आठवीं कक्षा तक के 500 केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ने वाले 70 हजार बच्चों के लिए तीसरी भाषा जर्मन के बजाय संस्कृत पढ़ने का आदेश मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा आगामी दिनों में आ सकता है। सवाल यह है कि तीसरी भाषा जर्मन ही क्यों? यदि बच्चों को अपने करियर या रोजगार के लिए विदेशी भाषा सीखनी है तो यह काम कई प्रायवेट संस्थाएं कर रही हैं। 12वीं या कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी बच्चे इसमें कोचिंग लेकर विदेशी भाषा सीख सकते हैं और कई तो सीख भी रहे हैं। 
 
भारत में कई निजी स्कूल हैं, जो अपने पाठ्‍यक्रम में बच्चों को छठी कक्षा से फ्रेंच या जर्मन भाषा सिखाते हैं। बच्चे भी भविष्य को देखते हुए इन विदेशी भाषाओं के प्रति आकर्षित होते हैं जबकि हकीकत यह है कि जैसे ही स्कूलों में संस्कृत की अनिवार्यता खत्म होती है, वैसे ही बच्चे यह कहकर जश्न मनाते हैं कि चलो...अब मुसीबत से पीछा छूटा...।
 
यानी इन स्कूली बच्चों के लिए संस्कृत भाषा एक मुसीबत है...। आखिर हमारी सोच कब बदलेगी? कब वो दिन आएगा जब हम अपनी भाषा से प्यार करना सीखेंगें? सवाल सिर्फ संस्कृत का नहीं है। देश की राजभाषा हिन्दी  का भी कम बुरा हाल नहीं है। स्कूली शिक्षा में जैसे ही हिन्दी  की अनिवार्यता खत्म होती है, बच्चे खुशी मनाने लगते हैं..। क्या यह राजभाषा का अपमान नहीं हैं? अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों की हिन्दी  कितनी कमजोर होती है, यह बताने की जरूरत नहीं है। क्या हम यह भरोसा रखें कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में हिन्दी ही नहीं बल्कि संस्कृत भाषा भी समृद्ध होगी?



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