भारतीय गेहूं के निर्यात पर रोक से जी-7 देश नाराज, खाद्यान्नों की कीमत बढ़ने का डर

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है। रूस और यूक्रेन भी गेहूं के सबसे बड़े उत्पादकों और निर्यातकों में गिने जाते हैं। किंतु दोनों के बीच चल रहे युद्ध के कारण कम से कम यूक्रेनी गेहूं का निर्यात इस समय बिलकुल रुक गया है। इससे मध्य-पूर्व और अफ्रीका के देशों में खाद्यान्न का भारी संकट पैदा हो गया है। भारत हफ्तेभर पहले तक बड़े गर्व और विश्वास के साथ कह रहा था कि वह अपने गेहूं के निर्यात द्वारा संकटग्रस्त देशों की सहायता करेगा। इस बीच स्थिति अचानक बदल गई है। भारत सरकार ने गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी है। पश्चिम के सबसे उन्नत देशों के ग्रुप G7 ने भारत के इस निर्णय की कड़ी आलोचना की है।

जर्मनी के श्टुटगार्ट शहर में G7 के कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में बोलते हुए जर्मनी के ने शनिवार को कहा कि भारत का यह निर्णय बहुत निराशाजनक है। इससे खाद्यान्नों की पहले से ही बढ़ रही कीमतें अब और बढ़ेंगी। G7 के अन्य कृषि मंत्रियों ने भी यही चिंता जताते हुए भारत से अपील की कि वह गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। जर्मन कृषि मंत्री का कहना था कि खाद्य पदार्थों के बड़े निर्यातकों का 'दुनिया के अन्य देशों के प्रति भी कुछ उत्तरदायित्व है।' G7 के कृषि मंत्रियों का यह सम्मेलन शनिवार को समाप्त हो गया।
जर्मनी के कृषि मंत्री जेम औएज्देमिर जर्मनी की पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टी के एक नेता हैं। उनका कहना था कि वे भारत सरकार के 'इस निर्णय के प्रति एक बहुत ही आलोचनात्मक दृष्टिकोण' रखते हैं। इस G7 सम्मेलन ने भारत से 'जी-20 के सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को निभाने' का आह्वान किया। सम्मेलन में भाग ले रहे देशों के कृषि मंत्रियों के बीच इस बात पर सहमति थी कि G7 के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को अब इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए।
जून के अंत में जर्मनी में ही G7 देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों का अगला शिखर सम्मेलन होने वाला है। जर्मनी ही इस समय इस ग्रुप का अध्यक्ष है। उसने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी एक सम्मानित अतिथि के रूप में इस सम्मेलन में आमंत्रित किया है। देर-सवेर G7 की सदस्यता का विस्तार करने और उसमें विश्व की अब 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए भारत को भी शामिल करने के सुझाव दिए जाते रहे हैं। भारत की दृष्टि से उचित पर G7 वाले देशों की दृष्टि में अनुचित भारतीय निर्णय से उसके प्रति समर्थन को आंच पहुंच सकती है।
वैश्विक राजनीति के मंच पर भारत का आर्थिक व राजनीतिक महत्व पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है, उसके कारण भारत से की जा रही अपेक्षाएं भी काफी बढ़ी हैं। इन अपेक्षाओं पर, जो कई बार तर्कसंगत नहीं भी हो सकती हैं, खरा उतरना भारत के लिए हमेशा संभव नहीं होगा। जर्मनी ही नहीं, इस ग्रुप के अन्य सदस्य़ देश अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और जापान भी निर्यात प्रतिबंधों का आमतौर पर विरोध करते हैं। वे बाजारों को खुला रखने पर जोर देते हैं, हालांकि ऐसे देशों के साथ आयात-निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से वे भी नहीं चूकते जिन्हें वे किसी कारण से दंडित करना चाहते हैं। रूस और ईरान इसके सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं।
गेहूं के निर्यात को लेकर भारत को अपनी उदारतापूर्ण घोषणा से पीछे इसलिए हटना पड़ा, क्योंकि वह कुछ समय से भीषण गर्मी की एक ऐसी लहर से पीड़ित है, जो 1910 के बाद से सबसे भीषण बताई जा रही है। दुनिया में दूसरे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक भारत को इस प्राकृतिक आपदा के आगे झुकना और यह कहना ही पड़ा कि वह तत्काल प्रभाव से गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रहा है। ऐसा नहीं करने पर स्वयं भारत में ही खाद्य सुरक्षा की स्थिति बिगड़ने लगेगी। भारत की ओर से एक सरकारी बयान में कहा गया है कि दुनियाभर में गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत और पड़ोसी देशों की खाद्य सुरक्षा को खतरा है। निर्यात पर रोक का उद्देश्य अपने देश में कीमतों में वृद्धि को रोकना है।
अतीत में गेहूं की अधिकांश फसल भारत में ही खप जाया करती थी। भारत 2022 और 2023 में 1 करोड़ टन गेहूं का निर्यात करना चाहता था ताकि रूसी आक्रमण के फलस्वरूप यूक्रेनी निर्यात में आई भारी गिरावट से पैदा हो रही कमी का लाभ उठाया जा सके। खरीदारों ने भी भारत पर भरोसा किया। भारत में न केवल यूरोप के लिए, बल्कि इंडोनेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड के लिए भी गेहूं के निर्यात पर विचार किया जा रहा था। भीषण गर्मी की लहर ने इन इरादों पर पानी फेर दिया है।
दुनिया में पिछले मार्च महीने से खाद्यान्नों की कीमतें जिस तेजी से बढीं, वैसी तेजी पिछले पूरे 1 दशक में नहीं देखी गई थी। एशिया और अफ्रीका के देशों को इसके सबसे गंभीर परिणाम झेलने पड़ेंगे। G7 के देशों का मानना है कि गेहूं पर तत्काल निर्यात प्रतिबंध ने दुनिया में अकाल पड़ने की चिंता को और अधिक बढ़ा दिया है। भारत के इस फैसले से अब विश्व बाजार में अनाज की कीमतों में और तेजी आने का डर है। भारत का कहना है कि मौजूदा आपूर्ति अनुबंधों को पूरा किया जाएगा। जिन अन्य देशों को अपनी 'खाद्य सुरक्षा' के बारे में गंभीर चिंता हो रही होगी, उन्हें भी गेहूं की आपूर्ति की जाएगी। हालांकि आपूर्ति की मात्रा को बढ़ाया नहीं जा सकेगा।
G7 देशों ने यूक्रेन को और भूख से संकटग्रस्त अन्य देशों को सहायता और समर्थन देने का संकल्प लिया। वास्तव में यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने दुनियाभर में हर प्रकार की चीजों की आपूर्ति को गड़बड़ा और लागत को बढ़ा दिया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यूक्रेन में पहले से ही हो गई कटनी के लगभग 2.50 करोड़ टन अनाज को देश से बाहर नहीं भेजा जा सका है। साथ ही आने वाली फसल की मात्रा भी अब तक के स्तर से कम ही होगी।
जर्मनी की नई विदेश मंत्री एनालेना बेअरबॉक ने चेतावनी दी कि इस संकट के परिणामस्वरूप अफ्रीका और मध्य-पूर्व में 5 करोड़ लोगों को भुखमरी से लड़ना पड़ सकता है। G7 के देश अब रास्ते निकालेंगे कि यूक्रेन के गोदामों में इस समय जो अनाज भरा पड़ा है, उसका निर्यात कैसे किया जाए? यूक्रेन के अपने बंदरगाह या तो रूसी सेना से घिरे हुए हैं या रूसी बमबारी से धवस्त हो गए हैं। रेलवे लाइनें और सड़कें भी खस्ता हालत में हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार/ विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/ विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती है।)



और भी पढ़ें :