क्रांतिदूत चे गेवारा के घर में

-ओम थानवी

अगस्त 2007 में जनसत्ता में सिलसिलेवार प्रकाशित ओम जी के आलेख हम यहाँ वेबदुनिया के पाठकों के लिए उपलब्ध करवा रहे हैं। हम आभारी हैं ओम थानवी के कि उन्होंने हमारे आग्रह पर ये आलेख हमें तुरंत उपलब्ध करवा दिए। इनके यहाँ प्रकाशन से ना केवल चे गेवारा कि भारत यात्रा के बारे में वेबदुनिया के पाठक जान पाएँगे बल्कि उस महान क्रांति दूत कि यादें भी ताजा हो पाएंगी। - संपादक
WD|
क्यूबा के राष्ट्रपति रहे दिवंगत फिदेल कास्त्रो मानते थे कि चे गेवारा में विलक्षण दूरदृष्टि थी। चे कास्त्रो मंत्रिमंडल के सदस्य भी थे। कास्त्रो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आइए जानते हैं उनके सहयोगी रहे क्रांतिदूत चे गेवारा के बारे में। 
चे गेवारा ( ग्वेरा)। एक क्रांतिदूत। एक जननायक। जितना बड़ा कार्य उन्होंने फिदेल कास्त्रो के साथ क्यूबा को साम्राज्यवादी शोषण से मुक्त करवाकर किया उससे कहीं ज्यादा महत्व उन्की उस छवि का है जो उन्होंने दमनकारी नीतियों और शोषण का प्रतीक बनकर हासिल की। सुनहरे सितारे वाली सैन्य टोपी और बढ़ी हुई दाढ़ी वाली उनकी छवि आज भी दुनिया भर में क्रांति और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ लड़ाई का प्रतीक है। क्यूबा में कास्त्रो सरकार में मंत्री बने रहकर आराम की जिंदगी जीने की बजाय वो साम्राज्यवाद के खिलाफ अगला मोर्चा फतह करने के लिए बोलिविया पहुँच गए। महज 39 साल की उम्र में वहाँ के जंगलों में लड़ते हुए शहीद हो गए। > >
ये क्रांति योद्धा 1959 में हिंदुस्तान आया था। एक ऐसी यात्रा जो ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी हो सकती थी। भारत के लिए भी और दुनिया के लिए भी। पर पता नहीं क्यों इसे ना तब महत्व दिया गया और ना ही इसको इतिहास के पन्नों पर उचित न्याय मिला। 2007 में वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने अपनी क्यूबा यात्रा के दौरान इसका एक सिरा तलाशा और फिर भारत आकर भी काफी शोध के बाद कास्त्रो कि उस यात्रा के संदर्भ में अहम तथ्य जुटाए।

 


हवाना में बारिश थी। हम अर्नेस्तो ‘चे’ गेवारा के घर की देहरी पर खड़े थे। हमारे तीन साथी भीगने के भय से गाड़ी के भीतर ही बैठे थे। साम्यवाद की अपनी रंगत है। हवाना में इस आकार का कोई अखबार नहीं निकलता कि वक्त-जरूरत सिर पर तान सकें। सब छोटे अखबार हैं।

Cheसांस्कृतिक बहुलता के ठप्पे वाला काला बस्ता मेरी गोद में था। उस संगोष्ठी में मिला था, जिसके बहाने क्यूबा (स्पानी में कूबा) गए थे। उसे सिर पर रखा और गाड़ी से निकल कर तेजी से भागा। पीछे दुलकी चाल से कवि केकी दारूवाला आए, जो इस बात पर हैरान थे कि गांधी का मुरीद चे के घर जाने को इतना बेचैन क्यों है! 

सच्चाई यह है कि इस उधेड़बुन से मैं आप जूझता रहा हूं। चे गेवारा का हिंसा का रास्ता मुझे कभी रास नहीं आया। आ नहीं सकता। जैसे भगतसिंह या दूसरे क्रांतिकारियों का। या अहमद शाह मसूद का। लेकिन ऐसे जुझारू शहीदों के सामाजिक बोध, संघर्ष और ईमानदारी को हमेशा नमन किया है।

हिंसा को चे संघर्ष का कारगर तरीका मानते थे, पर अकेला तरीका नहीं। यों खुद गांधी जी ने कहा था कि कायरतापूर्ण समर्पण से आत्मरक्षा या अरक्षितों की रक्षा के लिए की गई हिंसा कहीं बेहतर, वीरतापूर्ण काम है। गांधी जी तो हिंसा-रहित साम्यवाद के स्वागत को भी तैयार थे। यह कहते हुए कि बोल्शेविक जैसा आदर्श कभी व्यर्थ नहीं जा सकता, ‘‘जिसे लेनिन जैसी महान आत्माओं ने अपने बलिदान से पवित्र किया है।’’

बहरहाल, चे के व्यक्तित्व के विकास ने मुझे अपनी ओर ज्यादा खींचा। अर्जेंटीना में जन्म लेकर उन्होंने पूरे लातिनी अमेरिका की दुरावस्था से सरोकार कायम किया। डाक्टरी की डिग्री ली। मगर पढ़ा साहित्य। मित्र ग्रानादो के साथ नार्टन मोटरसाइकिल पर सवार होकर चिली (चीले) और पेरू से लेकर कराकास तक पांच हजार किलोमीटर की यात्रा की। समाज और राजनीति की नई चेतना के साथ लौटे। ग्वाटेमाला में उपनिवेशवाद का चेहरा करीब से देखा। मैक्सिको में फिदेल कास्त्रो से मिले। दोस्ती की। चिकित्सक की तरह साथ हुए और क्यूबा की सड़कों पर पूरी कमान संभाल कर उतरे। अपनी टुकड़ी के साथ सांता क्लारा पर कब्जा किया। क्रांतिकारियों की सरकार बनी। चे ने सत्ता देखी। दुनिया देखी। फिर पूंजीवाद के साथ रूस के जड़ साम्यवाद की आलोचना कर बैठे।

 

आगे पढ़ें...मात्र 39 वर्ष की आयु में मारे गए...




और भी पढ़ें :