नए सूर्य की उष्मा व प्रकाश

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डॉ. प्रणव पंड्‍या
नववर्ष 2008 ने हम सबके द्वारों पर दस्तक दी है। नए वर्ष के नए सूर्य से धरती का कोना-कोना प्रकाशपूर्ण चेतना से भर उठेगा। नववर्ष पर अवतरित होती हुई इस आध्यात्मिक चेतना के प्रति आज हम सचेष्ट एवं सजग बन सके, इसके आलोक में जीवन मार्ग पर अग्रसर हो सके तो उज्ज्वल भविष्य जरूर आएगा।


भविष्य के नए उजाले की नई मुस्कुराहटों की नई समृद्धि एवं खुशहाली की, लेकिन इन संभावनाओं को साकार करने में संघर्ष भी कम नहीं है। सुबह यदि संभावनाओं की है तो दिन संघर्षों का है। स्वस्थ प्रकृति एवं स्वच्छ प्रवृत्ति को अपना ध्येय वाक्य माने बिना उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ साकार नहीं होंगी।
भारतीय संस्कृति के अभ्युत्थान के लिए भारत के महापुरुषों, महान नारियों ने जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक किया, उसका सुफल उजागर होने लगा है। स्वास्थ्य के लिए ही सही, पर अब सभी के लिए योग स्वीकार्य होता जा रहा है।

यौगिक क्रियाएँ, यौगिक जीवनशैली राष्ट्रीय जीवन परिधि के साथ संपूर्ण विश्व वसुधा में आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। एलोपैथी की गोलियों से लोग अब छुटकारा पाना चाहते हैं। विश्व भर के लोगों का ध्यान अब आयुर्वेद की ओर है। जड़ी-बूटियों के चमत्कार अब चर्चा में हैं।
हमारे यहाँ कुछ शब्द बड़े प्रचलित हैं- चल रहा है, गाड़ी खिंच रही है, आखिर कब तक हम इस तरह जिएँगे। क्या हमें नहीं लगता कि हमारे अंदर से ही वह महामानव वह नेतृत्व करने वाला, प्रतिभाशाली व क्रांतिकारी पैदा हो, जो परिवर्तन लाएगा।

हम क्यों किसी ओर से आस लगाए बैठे हैं। क्या हम सभी ने अफीम की गोली खा ली है या ऐसे कुएँ का पानी पी लिया है, जिसमें भाँग भरी पड़ी है, कि हम अपनी अकर्मण्यता की साँखलों से बाहर भी नहीं आते हैं। स्वामी विवेकानंद, शहीद भगतसिंह, बापू, सुभाषचंद्र बोस का यह देश क्यों नहीं जागता?
हम इतने 'शार्टसाइटेड' (विवेकहीन) क्यों हो गए हैं। हमें तुरंत लाभ तथाकथित प्रगति ही सब कुछ दिखाई दे रही है। नैतिक उत्थान, भावनात्मक नवनिर्माण, चरित्रवान पीढ़ी का सृजन जैसे कार्य मात्र किताबी दिखाई देते हैं। यह मात्र हमारी ही नहीं सभी के मन की पीड़ा है। निश्चित ही बदलाव आरहा है और बदलाव तेजी पकड़ेगा, हम बदलेंगे, युग बदलेगा, हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।
एकता, समता, ममता, शुचिता के साथ वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का संदेश उत्साह लाएगा। ज्ञान क्रांति, विचार क्रांति में जीवनशैली में व्यापक परिवर्तन लाएगी एवं परिवर्तन की बयार एक महामारीकी तरह फैल जाएगी। सुसंस्कारिता एवं संवेदनशीलता पर टिका यह सक्रियता का तूफान रुकेगा नहीं एवं सतयुग की वापसी लाकर ही रहेगा। (नईदुनिया)



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