होली के रंग में रंगी ब्लॉग दुनिया

ब्लॉग-चर्चा में कुछ रंग-बिरंगे ब्लॉग की बातें

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चारों और होली का उल्लास अब भी बाकी है। खुमारी उतरी नहीं है। न रंग की और न ही भंग की। होली का रंग ही ऐसा होता है। गहरे उतरता है, गहरे चढ़ता है। लेकिन आसानी से छूटता नहीं है। जाहिर है उमंग और तरंग पर सवार होकर यह त्योहार हर रंग में रंग देता है। कहने की जरूरत नहीं कि ब्लॉग दुनिया में इसके रंग में रंगी हुई थी। लिहाजा इस बार ब्लॉग चर्चा में कुछ ब्लॉग पर बिखरें होली के रंगों की छटा देखते हैं, महसूसते हैं।

यहाँ रंग है, भंग है, कार्टून है, ग्रीटिंग हैं और हैं वाल पेपर्स। होली पर प्रेम कविताएँ हैं, परंपराएँ हैं। नशे की लत से विकृत होती परंपराएँ हैं तो उन पर टिप्पणियाँ भी हैं। जरा एक नजर मारिए। पृथ्वी अपने ब्लॉग कांकड़ पर होली के मौके पर बहुत ही खूबसूरत बात लिखती हैं। वे कहती हैं कि जीवन में रंगों का कोई विकल्‍प नहीं है। शुक्र है! यह बहुत बड़ी बात है। रंगों का कोई विकल्‍प नहीं होता।

रंग के साथ भंग (भांग) हो तो दुनिया नशीली हो जाती है। नशा रंग का होता है या भांग का, पता नहीं लेकिन यह सच है कि रंग अपने आप में बड़ा नशा है। होली पर धमाल गाने वाले हर किसी ने भंग नहीं पी होती। वे तो रंग रसिया होते हैं। रंगों के रसिया, झूमते हुए। उनके नशे की मादकता के आगे क्‍या भंग और क्‍या और. ..

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कहने की जरूरत नहीं कि रंग का ही यह नशा है कि लोग पानी की तमाम किल्लतों के बीच होली खेलने से अपने को रोक नहीं पाते। हर कहीं गुलाल उड़ती है, रंग उड़ता है और आपको भीतर तक रंग जाता है। यही कारण है कि लोग इस रंग में अपनों को नहीं भूलते। अपना पहर के ब्लॉगर होली पर अपनी माँ को याद करते हुए कहते हैं कि-फिर बैठक होली के दिन भी माँ ढेर सारे काम हम पर थोप देती।

रवींद्र व्यास|
साफ-सफाई..... रंग घोलना..... बर्तन साफ करना..... मेहमानों के लिए बनने वाली सब्जी साफ करना आदि-आदि। ......... इन सब कामों में मेरी दिलचस्पी कम ही हुआ करती थी। जाहिर है फिर माँ से बहस होती.... और कभी-कभी माँ की गाली भी खानी पड़ती।...... लेकिन अब जब ये सब देखने को नहीं मिलता.... तो सोचता हूँ कि वो दिन ही अच्छे थे। माँ की गाली में भी एक रंग था। ..... ये रंग काफी देर तक मुझ पर असर करता था।..... अब मैं बड़ा हो गया हूँ..... माँ मुझे नहीं डाँटती।..... पता नहीं वो क्यों बदल गई है?.... अब वो गाली भी नहीं देती। ... शायद सोचती होगी कि मैं शहर में रहता हूँ ..... और ज्यादा सभ्य हूँ



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