राइट टू एक्सप्रेशन बनाम राइट टू सर्पेशन

-संदीप तिवारी

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भारतीय संविधान ने लोगों को उनके एक बुनियादी अधिकार के तौर पर राइट टू एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) दी है, लेकिन जैसे-जैसे देश में आम लोगों के जीवन में धर्म और राजनीति की घुसपैठ हो रही है तो लोगों के लिए मिला यह ‍अधिकार राजनीतिज्ञों, धर्मप्रमुखों और उन सभी लोगों के लिए जो किसी भी प्रकार से लोगों की भीड़ इकट्‍ठा करना जानते हैं या कर सकते हैं, राइट टू सर्पेशन (दमन के अधिकार) में बदल रहा है।
पहले देश में इक्का दुक्के ही मामले आते थे क्योंकि तब केन्द्र या राज्य सरकारें लोगों में अशांति फैलने की संभावना के नाम पर, धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचने के नाम पर इस तरह के ब्रह्मास्त्र का उपयोग कम करती थीं, लेकिन अब यह बीमारी बहुत ज्यादा ही अनुपात में फैल गई है और इस स्थिति का दुखद पहलू यह भी है कि विवादों में पहले जहां न्यायालय के हस्तक्षेप और इसके फैसले को सर्वमान्य जाता था, अब कोई भी पक्ष इसे मानने को तैयार नहीं होता है। उसका कहना होता है कि यह उसकी धार्मिक अस्मिता, भावनाओं, देश की संस्कृति या सभ्यता का सवाल है इसलिए कोर्ट भी ऐसे मामलों के निपटाने में पूरी तरह से सक्षम नहीं आ रहा है।

हाल ही में प्रदर्शित एक फिल्म 'विश्वरूपम' को तमिलनाडु में प्रतिबंधित कर दिया गया। गौरतलब है कि तमिलनाडु ऐसा राज्य नहीं है, जहां पर सांप्रदायिक विद्वेष की घटनाएं या दंगे होते रहते हों। अभ‍ी तक लोगों के लिए फिल्म के मुख्य पात्र और निर्देशक अपनी फिल्मों के कारण हिंदूवादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं, लेकिन इस बार मुस्लिमों की भावनाएं आहत हो रही हैं।

हालांकि फिल्म को सेंसर बोर्ड ने यू सर्टिफिकेट देकर फिल्म को पास कर दिया, लेकिन राज्य सरकार को इसमें लोगों में अशांति के बीज फैलाने की संभावना दिख रही है। ऐसे हालात से दुखी निर्देशक को कहना पड़ा कि वे ऐसा होने पर दूसरे देश में भी बस सकते हैं। फिल्म प्रदर्शित भी हो गई और इसमें एक बहादुर भारतीय मुस्लिम युवक को हीरो बताया गया है, लेकिन डॉक्यूमेंट्री सरीखी इस फिल्म में कैसे अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत हो रही हैं, यह बात किसी की भी समझ में नहीं आ पा रही है?
इस फिल्म को लेकर जब फिल्मकार हाईकोर्ट गया तो एक सदस्यीय पीठ ने फिल्म पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया, लेकिन राज्य सरकार ने दोबारा दो सदस्यीय खंडपीठ में अपील कर दी और कोर्ट ने फिर से प्रतिबंध लगा दिया। तमिलनाडु की सरकार का कहना है कि फिल्म से कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है, लेकिन देश के जिन हिस्सों में यह फिल्म रिलीज हो चुकी है और चल रही हैं वहां ऐसी कोई बात नहीं देखी गई है?
अगर हम गौर से देखें तो राज्य सरकार या सच्चे अर्थों में मुख्यमंत्री जयललिता की कमल हासन से नाराजगी फिल्म को लेकर नहीं वरन अन्य कारणों से हैं। पिछले वर्ष दिसंबर में कमल हासन ने एक सार्वजनिक मंच से यह इच्‍छा जाहिर की थी कि वे एक धोती पहनने वाले ‍तमिल राजनीतिज्ञ (जिन्हें आप पी. चिदंबरम समझें) को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते हैं।
चिदंबरम से 'अम्मा' की चिढ़ को सभी जानते हैं। इसके अलावा कमल हासन के एक गलती और कर दी। के जो टीवी राइट्‍स (मुख्यमंत्री की सोच के अनुसार) जया टीवी को मिलने चाहिए थे, वे कमल हासन ने विजय टीवी को दे दिए। हालांकि इन्हें आप अफवाहें कहकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन जयललिता का कहना है कि वे फिल्म को राज्य में तभी रिलीज होने देंगी, जबकि कमल अल्पसंख्यक वर्गों या गुटों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर मामलों को निपटा लें।
हालांकि मुख्यमंत्री जया को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी समझा जाता है, लेकिन यह साधारण समझ की बात है कि वे अल्पसंख्यकों या इनके गुटों को नाराज नहीं करना चाहती हैं क्योंकि अगले आम चुनावों के बाद वे केन्द्र में किंगमेकर की भूमिका में आने का सपना देखने का भी हक रखती हैं।

आगामी लोकसभा में अल्पसंख्यकों (विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय) के वोट बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। हालांकि फिल्मों से जुड़े लोग कमल हासन के समर्थन में हैं, लेकिन राज्य सरकार ने फिल्म को प्रदर्शन का सर्टिफिकेट देने के लिए सेंसर बोर्ड को भी कोसा है। इसका मतलब क्या है? संभवत: सभी बड़े छोटे राजनीतिक दलों के नेता चाहते हैं कि सेंसर बोर्ड भी अपना सर्टिफिकेट जारी करने से पहले यह निश्चित करे कि इससे अल्पसंख्यकों, बहुसंख्यकों, अजा, अजजा, दलित, आदिवासी, उच्च वर्गों के लोगों की भावनाएँ आहत न हों और फिल्म में कोई भी संवाद, ‍दृश्य ऐसा न हो जो नेताओं, उद्योगपतियों, कारोबारियों से लेकर नक्सलियों और हत्यारों तथा बलात्कारियों को भी बुरा ना दिखाए या बताए।
वे इसे कहते हैं अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता। ऐसा लगता है कि अब वे दिन दूर नहीं जब सभी किस्मों के बुरे चरित्र भी फिल्मों को सर्टिफिकेट देने से पहले या किताबों के प्रकाशन से पहले यह मांग करेंगे कि फिल्में, किताबें उन्हें दिखाई जाएं या पढ़ाई जाएं ताकि वे तय कर सकें इन्हें लोगों को देखने, पढ़ने दिया जाए या नहीं।

शायद तुष्टीकरण की इसी नीति के चलते बंगाल की मुख्यमंत्री ममता ने सलमान रश्दी को कोलकाता में नहीं आने दिया क्योंकि जो समस्या 'अम्मा' की है, अल्पसंख्यकों वोटों को लेकर वही समस्या 'दीदी' की है। अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि राजनीति के हमामों में रहने वाले नेता अगर कला और साहित्य की परीक्षा करने लगे तो कैसी रचनाएं लिखी जाएंगी और कैसी फिल्में बनाई जाएंगी।



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