जसवंत का जिन्ना प्रेम

पुस्तक को लेकर विवादों से घिर गए जसवंत सिंह

Jasvant singh
स्मृति आदित्य|
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भाजपा नेता जसवंत सिंह अपनी 'जिन्ना: भारत-पाक विभाजन के आईने में' को लेकर विवादों से घिर गए हैं। इस पुस्तक में जसवंत सिंह ने लिखा है कि जिन्ना एक धर्मनिरपेक्ष नेता थे, उन्हें इतिहास के आईने में ठीक से देखा नहीं गया। यहाँ तक कि विभाजन के लिए उन्होंनें सरदार वल्लभभाई पटेल व जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार बताया।

जसवंत की पुस्तक के कटु विचार सामने आते ही देश भर में जिन्ना को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई। फिलहाल 'जिन्ना कौन थे' से अधिक अहम सवाल यह है कि जसवंत कौन है? जसवंत,बरसों एक विशेष विचारधारा को चुनावी मुद्दा बनाकर सत्ता हथियाने का प्रयास करने वाली भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। इस दल के नेता बरसों से एक धर्म विशेष के हिमायती रहे हैं। समझ में नहीं आता कि अचानक ये क्या जरूरत आन पड़ी कि जिन्ना की पूजा-अर्चना आरंभ करना पड़ी।

अगर यह अल्पसंख्यकों को लुभाने का उपक्रम है तो यकीनन बड़ा घटिया है। उपक्रम से अधिक यह हथकंडा नजर आता है। जिसे पहले पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी भी आजमा चुके हैं। अन्तत: मुँह की खाकर पुन: अपने खेमे में आकर बैठ गए।

हद तो यह है कि राष्ट्रवादी नेता सरदार पटेल तक पर शंका की सुई घुमाने से जसवंत नहीं चुके। यह जसवंत के दिमागी दिवालिएपन की निशानी है। एक ऐसे वक्त में जब सांप्रदायिकता कभी भी बिफर उठने को बेताब बैठी हो इस पुस्तक का आना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह पुस्तक उन हजारों बेगुनाहों की मौत का अपमान है जो विभाजन की त्रासदी में शहीद हो गए।
यह जसवंत की चालाक मानसिकता का संकेत है, वे जानते थे कि पुस्तक, देश के मीडिया की बहस से नहीं बचेगी और मुफ्त की पब्लिसिटी उनकी झोली में होगी। यह भाजपा नेताओं का कैसा चेहरा है जो हिन्दुत्व के दम पर सत्ता हथियाते है और उस व्यक्ति के गुणगान में पन्ने काले करते है जिसने राष्ट्र को गहरा जख्म दिया?

प्रश्न यह भी है कि इतिहास में उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की लंबी फेहरिस्त है जिनके योगदान का आज तक मूल्यांकन नहीं हुआ ऐसे में जसवंत को जिन्ना ही मिले थे पुस्तक लिखने के लिए? या फिर जान-बूझकर भीड़ में से जिन्ना को उठाया गया, उस पर मशक्कत की गई और तथ्यों का उलटफेर कर पुस्तक लिख दी गई?
अगर ऐसा नहीं है तो अब तक जसवंत का जिन्ना प्रेम कभी, कहीं किसी अवसर पर छलका क्यों नहीं? अचानक जसवंत जिन्ना के प्यार में इतने भर उठें कि सैकड़ों पन्ने रंग डाले? यह सवाल इसलिए भी अहम है कि देश की जनता को अपने दुराग्रह छुपाकर छलने का किसी नेता को कोई हक नहीं। देश की जनता के लिए चाहे आप हिन्दुवादी ना हो मगर राष्ट्रवादी भी ना रहें तो पूरा चरित्र ही संदेहास्पद है।
भाजपा ने अपनी पारंपरिक छवि का ख्याल रखते हुए तत्काल प्रतिक्रियास्वरूप जसवंत को निकाल बाहर किया। पार्टी का बयान है कि यह किताब पार्टी की 'कोर आइडियोलॉजी' के खिलाफ है। लेकिन यहाँ इस प्रकरण को इस तरह से देखा जा रहा है कि यूँ भी भाजपा में पहली पंक्ति के नेताओं के लिए ना जगह रह गई है ना जरूरत। यह निष्कासन लगभग तय था।

अग्रिम पंक्ति के नेता चाहे मुरली मनोहर जोशी हो या यशवंत सिन्हा, इनकी तुलना में भाजपा सेकेंड लाइन नेताओं जेटली, स्वराज, मोदी या राजनाथ जैसे के भरोसे भविष्य तलाश रही है। ऐसे में जसवंत को 'साइड लाइन' करने का यही सुनहरा मौका था जिसे पार्टी ने भुनाने में एक पल की देरी नहीं की। बहरहाल, जिन्ना इतने सालों बाद भी विभाजन कराने में कितने सक्षम है, यह इस प्रकरण से जाहिर है।



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