शिवाजी पर अतार्किक हल्ला

विश्वनाथ सचदेव| Last Updated: सोमवार, 3 नवंबर 2014 (17:49 IST)
मैंने छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में लिखी जेम्स लेन की किताब नहीं प़ढ़ी है। मैंने वे किताबें भी नहीं पढ़ी हैं, जिनके हवाले से जेम्स लेन ने अपनी किताब में शिवाजी के बारे में कथित आपत्तिजनक जानकारी दी है। लेकिन, बावजूद इस अज्ञान के अब मुझे कुछ अंदाज है कि लेन की किताब में क्या लिखा गया था, जिस पर पहले पुणे के एक संगठन को आपत्ति थी और अब शिवसेना को है।

यह अंदाज मुझे कभी न लगता यदि इस किताब पर प्रतिबंध लगाने की बात को लेकर महाराष्ट्र में हल्ला न मचता और यदि यह सब न होता तो शायद मैं यह किताब कभी प़ढ़ता भी नहीं। मेरे जैसे और भी न जाने कितने होंगे, जो इस पुस्तक के बारे में कुछ भी न जान पाते। लेकिन अब मैं जानना चाहता हूँ कि आखिर क्या लिख दिया है लेन ने उस किताब में कि न्यायालय द्वारा पुस्तक की बिक्री पर लगाए सरकार के प्रतिबंध को अवैध करार दिए जाने के बाद शिवसेना सुप्रीमो ने आदेश जारी कर दिया है कि पुस्तक जहाँ भी दिखे, उसे जला दिया जाए।

शिवाजी महाराज हर भारतीय की तरह मेरे भी नायक हैं और मैं यह मानता हूँ कि किसी लेन के कुछ लिख देने से उनके प्रति मेरे सम्मान में कोई अंतर नहीं आ सकता। मैं यह भी मानता हूँ कि हमारे नायकों के बारे में किसी को कुछ भी ऊल-जलूल लिखने का हक नहीं बनता। लेकिन, मैं यह भी मानता हूँ कि हमने एक व्यवस्था को स्वीकारा है, कोई बात कानून सम्मत हो या नहीं, इसके निर्णय के लिए हमारे पास एक न्याय व्यवस्था है और सही और गलत पर निर्णय देने का अधिकार हमने इस व्यवस्था को दे रखा है।
ऐसी किसी व्यवस्था के अभाव में अराजकता फैलती है। चूँकि हम जंगल राज में नहीं, कानून के शासन में विश्वास करते हैं, इसलिए न्यायालय के निर्णयों का सम्मान करना हमारा कर्तव्य बनता है। आज यदि लेन की पुस्तक के बारे में न्यायालय ने निर्णय दिया है और कोई उससे सहमत नहीं हो पा रहा, तो उसे ऊँची अदालत में जाने का पूरा अधिकार है। यही उचित रास्ता है। अपने पक्ष में जनमत बनाने के लिए सड़कों पर उतरना भी हमारे जनतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है, शिवसेना को पूरा अधिकार है अपनी बात कहने का। लेकिन दो साल पहले पुणे में पुस्तक के विरोध में जिस तरह हिंसक प्रदर्शन हुए थे, वह गलत था और आज भी यदि उस तरह की कोई कार्रवाई होती है तो वह सही नहीं होग। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन के माध्यम से अपनी बात कहने का अपनी बात मनवाने की कोशिश करने का अधिकार सबको है।
यह सारी बातें अभिव्यक्ति की उस स्वतंत्रता के संदर्भ में हैं, जो हमारा संविधान प्रदत्त अधिकार है। यह जनतांत्रिक मूल्य भी है। मैं यहाँ फिर दुहराना चाहता हूँ कि इस स्वतंत्रता का मतलब उच्छंखलता नहीं है और न ही इसका अर्थ यह है कि आप कुछ भी कह सकते हैं। विवेक और तर्क पर आधारित अपनी बात कहने का, अपनी राय प्रकट करने का, अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार जनतांत्रिक परंपरा का आधारभूत हिस्सा है।
इसी सिद्धांत के चलते अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाना गलत माना जाता है तो पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं माना जाता। इसी आधार पर लेन की पुस्तक पर महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के निर्णय को चुनौती दी गई थी और इसी आधार पर न्यायालय ने इस प्रतिबंध को गलत ठहराया। इस निर्णय को चुनौती दी जा सकती है, लेकिन अपनी बात मनवाने के लिए कानून अपने हाथ में लेना सही नहीं है। ऐसी प्रतिक्रिया उस असहिष्णुता को ही अभिव्यक्ति देती है, जिसके हम लगातार शिकार होते जा रहे हैं।
संसद से लेकर स़ड़क तक यह असहिष्णुता दिखने लगी है। जिस तरह का शोर-शराबा, आरोप-प्रत्यारोप संसद के सदन में दिखाई देता है, वह कुल मिलाकर दूसरे की अभिव्यक्ति के अस्वीकार को ही दर्शाता है। हाल ही में हमने जयपुर में एक ईसाई अध्यापक के घर पर मारपीट के दृश्य टीवी पर देखे थे। यह कानून के शासन को न स्वीकारने की प्रवृत्ति का ही परिचायक था। यदि वह व्यक्ति कुछ गलत कर रहा था तो उसे गलती का अहसास कराने या गलती की सजा देने के विधिसंगत तरीके हैं हमारे पास।
इस तरह महापुरुषों की मूर्तियों की अवमानना करनेवाले और फिर दंगों के माध्यम से अपने गुस्से का इजहार करने वाले भी कानून की अवहेलना ही करते हैं। कानून के शासन का तकाजा है कि हर नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति समान रूप से सजग रहे। यही जनतंत्र की सफलता का सबसे ब़ड़ा आधार भी है। अपनी-अपनी मर्यादा में रहकर एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करके ही हम जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप जी सकते हैं।
यह परस्पर सम्मान की भावना और एक-दूसरे के अधिकारों का स्वीकार ही उस आपसी समझ को जन्म देगा जो एक विवेकपूर्ण, न्यायसंगत समाज की मूल आवश्यकता है। अपने सोच को दूसरों तक पहुँचाने और उन्हें अपने अनुकूल बनाने की प्रवृत्ति और कोशिश कतई गलत नहींहै, लेकिन जब यह कोशिश अतार्किक और अविवेकपूर्ण तरीके से होने लगे तो वह सही नहीं कही जा सकती। इससे या तो अराजकता पनपेगी या तानाशाही। यह दोनों ही स्थितियाँ जनतंत्र के हमारे आदर्शों का नकार हैं।
एक बात और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ असहमति का अधिकार भी जु़ड़ा है। मुझे अपनी बात कहने का हक है। मुझे आपकी बात से असहमत होने का भी हक है। लेकिन यही हक आपको भी है। इसीलिए हमारी संसद का एक ध्येय वाक्य है- हो सकता है मैं आपके विचारों से असहमत हूँ, लेकिन आपके अपनी बात कहने के अधिकार की रक्षा मैं फिर भी करूँगा।

यह ध्येय वाक्य जहाँ एक ओर दूसरे के विचारों के सम्मान का परिचय देता है, वहीं इस आवश्यकता को भी रेखांकित करता है कि बात कहने और बात सुनने की मानवीय संस्कृति ही उस सहिष्णुता को आकार देती है, जो सभ्य समाज की आवश्यकता भी है और पहचान भी। इसीलिए जनतंत्र विचारों पर प्रतिबंध को स्वीकार नहीं करता। इसीलिए किसी सलमान रश्दी की पुस्तक पर प्रतिबंध भी गलत होता है और जेम्स लेन की पुस्तक पर भी।
किसी गलत पुस्तक या विचार का प्रतिकार प्रतिबंध लगाने से नहीं होता। उसे समझकर उसके अस्वीकार से होता है। विचारों का मुकाबला विचारों से होना चाहिए। समाज के नेतृत्व का यह दायित्व बनता है कि वह समाज में विचार करने की शक्ति जगाए, विवेक में समाज की आस्था जगाए। यह शक्ति और यह विवेक ही किसी भी जेम्स लेन की गलतबयानी और कथित गलत मंशाओं का सही उत्तर है।



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