जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम

विष्णुदत्त नागर| विष्णुदत्त नागर|
पिछले दिनों रिजर्व बैंक द्वारा भारत में असामान्य रूप से बढ़ते विदेशी पूँजी प्रवाह के प्रति केंद्र सरकार को दी गई चेतावनी ने कविवर रहीम की इस उक्ति की याद दिला दी-'ज्यों जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम, दोऊ हाथ उलीचिए यही सज्जन को काम।'

रिजर्व बैंक द्वारा चेतावनी में कहा गया है कि 203 अरब डॉलर से अधिक के विदेशी मुद्राकोष और पिछले नौ वर्षों में डॉलर के मुकाबले में रुपए की कीमत में हुई असामान्य वृद्धि के संदर्भ में सरकार को विदेशी मुद्रा प्रबंधन विधेयक (फेमा) के प्रावधानों की समीक्षा करना चाहिए, ताकि बाजार में अल्पावधि के विदेशी पूँजी प्रवाह की तरलता और वाष्पशीलता पर रोक लगाई जा सके।

रिजर्व बैंक की विशेष चिंता इस बात को लेकर है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा सहभागिता और उपखातों के माध्यम से भारत में पूँजी आगम के द्वार खुले हुए हैं। बैंक ने चेतावनी दी है कि जैसे ही अर्थव्यवस्था के बढ़ने की गति धीमी हुई, सबसे पहले विदेशी पूँजी निवेशक अपनी पूँजी खेंचकर बाहर चले जाएँगे।

विदेशी पूँजी ने जहाँ एक ओर परिसंपत्ति मूल्य में असाधारण वृद्धि की है, वहीं दूसरी ओर वित्तीय अस्थिरता भी पैदा की है। वर्तमान परिदृश्य में रियल इस्टेट (जमीन-जायदाद) क्षेत्र में पूँजी प्रवाह से राजकोषीय लागत ही नहीं बढ़ी है, बल्कि तरलता और मौद्रिक प्रबंधन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। इसी संदर्भ में बैंक ने अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में जापानी अर्थव्यवस्था में आई मंदी और 1997-98 में पूर्वी एशियाई देशों में आए वित्तीय संकट की याद दिलाते हुए परिसंपत्ति के मूल्य गुब्बारे की याद दिलाई।
इसके अलावा दो दिन पूर्व सरकार ने घरेलू कंपनियों द्वारा 2006-07 में बाजार से 22 अरब डॉलर के ऋण लेने की पृष्ठभूमि में आगे विदेशी ऋण लेने पर अंकुश लगाया है। वित्त मंत्रालय के निर्णय से रियल इस्टेट और भवन निर्माण से जुड़ी कंपनियों के लिए विदेशी बाजार से ऋण लेना कठिन हो जाएगा।

नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध के प्रारंभ में पूर्वी एशियाई देशों, विशेषकर इंडोनेशिया, थाईलैंड में विदेशी पूँजी प्रवाह में अल्पावधि की पूँजी की बाढ़ आई। वहाँ के बैंकों, सरकारी और वित्तीय संस्थाओं ने मूल गलती यह कर दी कि अल्पावधि के विदेशी ऋणों का उपयोग दीर्घकालीन होटल, बहुमंजिली इमारतों, अतिथिगृहों इत्यादि के निर्माण में किया। वहाँ मुद्रा का प्रसार असामान्य गति से बढ़ा।
वित्तीय कुप्रबंधन के कारण जब विदेशी निवेशकों ने अपनी पूँजी वापस करने की माँग की तब अनेक बैंकों का दीवाला निकला और पूर्वी एशियाई देशों पर वित्तीय संकट की छाया गहरी होती गई। यह तो इन देशों की सरकारों और लोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति का ही परिणाम था कि शीघ्र ही ये देश वित्तीय संकट से उभर आए और पुनः अपनी अर्थव्यवस्था में तेजी ला दी। यही स्थिति अर्जेंटीना, मैक्सिको और अन्य लेटिन अमेरिकी देशों की हुई, जहाँ विदेशी पूँजी की साजिश में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष भी शामिल थे।
भारत को इन देशों की अर्थनीति के गुणों और गलतियों दोनों से सीखना है विशेषकर इसलिए कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था अपने आपको वैश्विक व्यावसायिक चक्रों से दूर नहीं रख सकती। नब्बे के दशक की बात अलग थी, जब वैश्विक वित्तीय अर्थव्यवस्था के उथल-पुथल भारतीय बाजार को प्रभावित नहीं करते थे।

आज जिन शर्तों पर और जिन क्षेत्रों में विदेशी पूँजी भारत आ रही है, वह न तो हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुकूल है और न ही हमारी आवश्यकताओं और लक्ष्य को हासिल करने में सहयोगी है। विदेशी पूँजी और विदेशी माल दोनों का एकमात्र ध्येय घरेलू बाजार पर कब्जा करना है। दोनों का सारा जोर या तो मध्यवर्गीय बाजार के अनुकूल उपभोक्ता सामानों की बिक्री या फिर सेवा क्षेत्र के अधिकाधिक लाभ देने वाले बैंक, बीमा, दूरसंचार जैसे क्षेत्रों पर है। विदेशी पूँजी और विदेशी वस्तुओं के दायरे में गरीबी उन्मूलन, रोजगार निर्माण, सामाजिक ढाँचागत क्षेत्रों का विकास नहीं आते।
विदेशी पूँजी को आर्थिक अवतार समझने वाले हमारे नीति-निर्धारक संभवतः इस तथ्य से अवगत होंगे कि विदेशी पूँजी का प्रवाह सिर्फ दस औद्योगिक देशों तक सिमटकर रह गया है। बाजार और लाभ की गारंटी के भरोसे आई विदेशी पूँजी विलयन और अधिग्रहण की प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रही है, जिसके जरिए बड़ी और ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ छोटी और कमजोर कंपनियों को अधिगृहीत कर सकती हैं।
इससे संकेंद्रीयकरण कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सिमटता जा रहा है और वह समय दूर नहीं जब हमारे देश के उद्योगपति या तो उनके कनिष्ठ सहयोगी के रूप में या एजेंट के रूप में अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो देंगे और तब हमारे बाजार और हमारी अर्थव्यवस्था विशालकाय और महाशक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में होगी, जो दैत्य से दैत्याकार रूप लेती हुई हमारी अर्थनीति के स्वदेशीकरण के वादों पर प्रहार करती रहेगी।
भू-मंडलीकरण के इस दौर में भारत पर आर्थिक रूप से गुलाम बनने का खतरा तो मँडराता रहेगा ही, साथ ही दूसरे देशों के हस्तक्षेप के कारण हमारे संप्रभु राष्ट्र-राज्य की अवधारणा भी संकट में पड़ जाएगी। ऐसी स्थिति में लड़ाई बाहर से ही नहीं अंदर से भी लड़ना होगी। जहाँ तक 203 अरब डॉलर से अधिक विदेशी मुद्राकोष का संबंध है, रिजर्व बैंक के आकलन के अनुसार 2006-07 में विदेशी मुद्राकोष पर होने वाली प्राप्तियाँ 4 प्रतिशत से भी कम थीं, अर्थात्‌ वास्तविक आधार पर प्राप्तियाँ ऋणात्मक थीं।
वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने 203 अरब डॉलर के विशाल विदेशी मुद्राकोष के आंशिक प्रबंधन के लिए आधे-अधूरे मन से दो विदेशी कंपनियों के गठन का प्रावधान किया है। हाल में सुझाव यह भी दिया गया है कि विदेशी मुद्रा के उपयोग के लिए क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों का गठन किया जाए, जो लाभ देने वाली घरेलू परियोजनाओं में निवेश कर सके। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में विदेशी मुद्राकोष के एक भाग का उपयोग अमेरिकी प्रतिभूतियाँ (ब्राण्ड) खरीदने में किया जा रहा है, जिस पर सालाना 3 से 4 प्रतिशत का ब्याज मिलता है, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्राकोष में जमा विभिन्न प्रकार की राशियों पर 7 से 8 प्रतिशत का ब्याज देना पड़ता है। विदेशी मुद्राकोष के प्रबंधन पर हमें 4 अरब डॉलर का खर्च करना पड़ता है।
असल में अमेरिकी प्रतिभूतियाँ खरीदकर हम अमेरिका के 839 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी अपनी या सूखे से जूझ रहे दक्षिण-पूर्व एशिया की करीब 200 अरब डॉलर की आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर रहे हैं। एक समय था, जब कहा जाता था कि जब अमेरिका को छींक आती है तो शेष विश्व को ठंड पकड़ लेती है, लेकिन अब स्थिति यह है कि जब अमेरिका को छींक आती है तो भारत, चीन, जापान समेत अन्य देश अपने विदेशी मुद्राकोष से अमेरिकी व्यापारिक घाटा कम करने की ओर जुट पड़ते हैं।
यह काव्योक्ति सही ही है कि 'बहता पानी निर्मला, खड़ा-सा गंदला होय।' यह उक्ति विदेशी मुद्राकोष के उपयोग पर ही नहीं, बल्कि निजी और सार्वजनिक संपत्ति के प्रबंधन पर भी लागू होती है। चाहे सरकार को 4 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राजस्व प्राप्तियाँ हों या देश के अति समृद्ध लोगों की 3 करोड़ डॉलर की तरल वित्तीय परिसंपत्तियाँ हों। संपत्ति प्रबंधन का उपयोग सामाजिक कार्यों और आने वाली पीढ़ी पर खर्च किया जाना चाहिए।
केब्जेमिनी और मेरिल लिंच की 'विश्व समृद्धि रिपोर्ट 2006' ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बलशाली अर्थव्यवस्था निरूपित किया है। साथ में अतिसमृद्ध घरानों पर भी भार डाला है कि वे अभी से वित्तीय नियोजन बोर्ड का गठन करें, क्योंकि 2009 में भारतीय बैंक और वित्तीय व्यवसाय विदेशी बैंकों और संस्थाओं के लिए खोले जाने के बाद सामाजिक संपत्ति प्रबंधन बहुत जरूरी हो जाएगा।(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं।)



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