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कोरानावायरस के कारण अस्पतालों में भी हो रहे हैं स्थायी बदलाव

Updated: शनिवार, 25 जुलाई 2020 (15:37 IST)
नई दिल्ली। कोरोनावायरस (Coronavirus) ने न सिर्फ जीवन के प्रति लोगों का नजरिया बदला है बल्कि इसकी वजह से लोगों की जीवनशैली तथा जनजीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्थायी परिवर्तन देखे जा रहे हैं।
 
विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए अस्पतालों में साफ-सफाई और सेनिटाइजेशन आदि को लेकर किए गए बदलाव अब स्थायी तौर पर हो गए हैं। ये बदलाव निजी तथा सरकारी दोनों अस्पतालों में देखे जा सकते हैं। एम्स जैसे संस्थानों में इसका कड़ाई से पालन हो रहा है, जबकि जिला स्तर पर इसके प्रति उदासीनता है। सरकारी अस्पतालों के अनुसार संसाधनों की कमी और मानव संसाधनों के अभाव के कारण ऐसा हो रहा है।
 
दिल्ली के फोर्टिस-एस्कॉर्ट हार्ट रिसर्च इंस्टीट्‍यूट के न्यूरोसर्जरी विभाग के निदेशक डॉ. राहुल गुप्ता कहते हैं कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बहुत ही सावधानी के साथ हाथ धोना, मास्क, ग्लव और हॉस्पिटल स्क्रब का प्रयोग करना अनिवार्य हो गया है।
 
अस्पताल के कर्मचारियों के अलावा मरीजों तथा उनकी देखभाल करने वालों की जांच थर्मल सेंसर के जरिए प्रवेश द्वार पर ही की जाती है और इसके अलावा उनसे पिछले 15 दिनों के दौरान उनकी यात्रा के बारे में तथा बुखार, शरीर में दर्द, कोल्ड, कफ या अन्य श्वसन संबंधी लक्षणों के बारे में पूछा जाता है। अगर उनमें ऐसे लक्षण मिलते हैं या उन्हें पहले ऐसी समस्या हो चुकी है तो आगंतुक को चिकित्सा परिसर के बाहर ही रहने तथा आगे की निर्देशों के लिए संक्रामक रोग (आईडी) विशेषज्ञ से मिलने के लिए कहा जाता है।
 
उन्होंने बताया कि अस्पतालों में अब मरीजों एवं डॉक्टरों के बैठने की व्यवस्था में भी व्यापक बदलाव किया गया है। कई अस्पतालों में प्रतीक्षा कक्ष से कुर्सियां हटा दी गई हैं। केवल बहुत बीमार या कमजोर मरीजों के लिए ही सोशल डिस्टेंसिंग के दिशानिर्देशों के अनुसार कुर्सियां रखी गई हैं।
 
डॉ. राहुल गुप्ता ने बताया कि रोगियों को या तो अकेले और अनिवार्य होने पर एक परिचारक को अपने साथ अस्पताल लाने के लिए कहा जाता है और दोनों को मास्क पहनने के साथ-साथ उपचार परिसर में प्रवेश करते ही अपने हाथों को साफ करने के लिए कहा जाता है। वेटिंग हॉल में दो व्यक्तियों के बीच तीन फुट की दूरी होती है। रिसेप्शन के कर्मचारियों को मरीजों से अलग रखा जाता है। इसके लिए तीन फीट की दूरी के लिए क्यू-मैनेजर बनाया गया है।
 
दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के सर्जन डॉ. अभिषेक वैश्य कहते हैं कि अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के कार्यालयों में भीड़भाड़ तथा लोगों की आवाजाही को कम करने के लिए कई हॉस्पिटल एवं चिकित्सक मरीजों को यह सलाह दे रहे हैं कि वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही परामर्श लें। कई तो इसे लागू भी कर रहे हैं।
 
किसी डॉक्टर के यहां या किसी हेल्थकेयर सेंटर जाने के बजाय रिमोट केयर की मदद से मरीज को क्लिनिकल सेवा प्रदान की जा सकती है। कोविड-19 के पहले कई हेल्थकेयर प्रदाता रिमोट केयर को लेकर दुविधा में थे, लेकिन अब जब कई क्षेत्रों में सोशल डिस्टेंसिंग को अनिवार्य बना दिया गया है तब चिकित्सकों में भी इसके प्रति यह दिलचस्पी बढ़ गई है।
 
मेदांता मेडिसिटी के कैंसर इंस्टीट्‍यूट के रेडिएशन ओंकोलॉजी की प्रमुख डॉ. तेजिन्दर कटारिया के अनुसार अब अस्पताल में कोविड-19 के मरीजों के लिए पूर्ण रूप से संक्रामक रोग (आईडी) विभाग बन गया है। कैंसर जैसी बीमारियों के मरीजों के लिए अलग से एक प्रवेश द्वार (ग्रीन कॉरिडोर) बनाया गया है।
 
उन्होंने कहा कि सुरक्षा मानदंडों को बनाए रखने के लिए प्रतीक्षा कक्ष से पत्रिकाओं, पुस्तकों और समाचार पत्रों को हटा लिया गया है। कई अस्पतालों में हर मरीज द्वारा उपयोग में लाई गई सामग्रियों को साफ करने के लिए खास विधि लागू की गई है और हाउस कीपिंग कर्मचारी उस विधि का पालन कर रहे हैं। हर चार घंटे में हाउस कीपिंग कर्मचारी सोडियम हाइपोक्लोराइट (ब्लीच) के घोल से डोर-नॉब, हैंडल, कंप्यूटर मॉनिटर, बैनिस्टर, फ्लोर, चमकदार सतहों को साफ करते हैं। सभी प्रवेश द्वारों को खुला रखा जाता है ताकि लोगों द्वारा इनके छूने की आशंका कम से कम हो।
 
नोएडा के यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉ. कनिका अग्रवाल कहती हैं कि अस्पतालों ने गर्भवती महिलाओं के लिए आवश्यक सावधानियां बरतनी शुरू कर दी हैं। अस्पताल में सामाजिक दूरी के नियमों को ध्यान में रखते हुए प्रवेश द्वार से लेकर ओपीडी क्षेत्र तक मरीजों की फ्लू स्क्रीनिंग होती है।
 
प्रसूति वार्ड में प्रसव के दौरान पर्सनल प्रोटेक्टिव उपकरणों का समुचित इस्तेमाल होता है। हर डिलीवरी और सीजेरियन प्रक्रिया सम्पूर्ण पीपीई किट पहन कर की जाती है। हर लेबर रूम और ऑपरेशन थिएटर को नियमित रूप से सेनेटाइज किया जाता है। पूर्व बुकिंग के साथ-साथ ‘वॉक इन’ मामले भी आते हैं और इन सभी मामलों में समुचित रूप से विस्तृत यात्रा इतिहास लिया गया है, जोन चेक (ग्रीन, ऑरेंज या रेड) किया जाता है और बुखार, खांसी तथा सर्दी जैसे लक्षणों की जांच की जाती है।
 
अस्पताल में बच्चों के लिए अलग से विशेष ओपीडी सेवा शुरू की गई है। इसके कारण बच्चे अस्पताल आने वाले अन्य लोगों के संपर्क में आने से बचे रहेंगे। इस क्षेत्र में काम कर रहे हेल्थकेयर पेशेवर भी संक्रमण के नियंत्रण की सभी आवश्यक सावधानियां बरतते हैं ताकि माता-पिता नियमित जांच या नियमित टीकाकरण के लिए या अन्य बीमारियों के उपचार या परामर्श के लिए तनावमुक्त होकर अस्पताल आएं।
 
डॉ. अभिषेक वैश्य ने कहा कि इस महामारी के समय स्पर्शरहित (टचलेस) इंटरफेस एवं इंटरेक्शन को महत्व दिया जा रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में यह अधिक देखने को मिल सकता है। कोविड-19 ने हममें से ज्यादातर को उन सभी स्पर्श की जाने वाली (टचेबल) सतहों के प्रति अतिसंवेदनशील बना दिया है जो संक्रमण को फैला सकती हैं। (वार्ता)

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