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बन जाओ एक पहेली न रहो बनकर पहेली

पहेली पज़ल डे
एक बार चंद्र नाम का एक व्यापारी भरी गर्मियों में धूप से बचने की छतरी लगाए अपने गाँव की ओर बढ़ रहा था कि रास्ते में उसे एक घने वृक्ष की छाँव में छतरी लगाए बैठा एक युवक दिखा। छाँव में छतरी लगाना चंद्र को अजीब लगा। नजदीक आने पर युवक ने अपना नाम श्रेणिक बताकर चंद्र के साथ चलने की इच्छा जाहिर की और दोनों साथ हो लिए।

रास्ते में प्यास लगने पर उन्होंने एक गाँव के कई घरों में पानी माँगा, लेकिन जब किसी ने भी पानी नहीं पिलाया तो वे प्यासे ही आगे बढ़ गए। इस पर श्रेणिक बोला कि कितना वीरान गाँव था। चंद्र को उसकी बात समझ नहीं आई। आगे एक नदी मिली जिसे पार करने से पहले चंद्र ने अपनी फटी जूतियाँ उतार लीं, लेकिन श्रेणिक अपनी नई कीमती जूतियाँ पहने हुए ही नदी में उतर गया। चंद्र को पूरी तरह विश्वास हो गया कि ये युवक निश्चित ही पागल है।

अंततः चंद्र अपने गाँव पहुँच गया। वह श्रेणिक को एक वृक्ष के नीचे बैठाकर घर पहुँचा। वहाँ उसने अपनी विदुषी पुत्री नंदी को श्रेणिक के बारे में बताकर पूछा कि उसकी बातें एक पहेली की तरह हैं। मैं निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि वह मूर्ख है या बुद्धिमान। नंदी बोली- पिताजी, वह निश्चित ही बुद्धिमान है, क्योंकि पेड़ के नीचे छतरी उसने पक्षियों की बीट से बचने के लिए तानी थी और जिस गाँव में अतिथि का सत्कार न हो, वह तो वीरान ही हुआ न।
  एक बार चंद्र नाम का एक व्यापारी भरी गर्मियों में धूप से बचने की छतरी लगाए अपने गाँव की ओर बढ़ रहा था कि रास्ते में उसे एक घने वृक्ष की छाँव में छतरी लगाए बैठा एक युवक दिखा। छाँव में छतरी लगाना चंद्र को अजीब लगा।      


रही जूतियों की बात तो पैर उनसे ज्यादा कीमती हैं। और अनजान नदी पार करते समय तो पैरों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। इसके बाद चन्द्र ने श्रेणिक को घर बुलाकर उसका सत्कार किया।

दोस्तो, कहते हैं सयानों की बातें सयाने ही जानें। यानी एक बुद्धिमान ही दूसरे बुद्धिमान की बातें समझता है, समझ सकता है। सामान्य व्यक्ति तो ऐसी बातें करने वालों को बेवकूफ या पागल करार दे देते हैं।

लेकिन यहाँ बात यह है कि किसी को भी मूर्ख घोषित करने, मानने से पहले यह विचार कर लेना चाहिए कि कहीं वह वास्तव में जीनियस तो नहीं, अति बुद्धिमान तो नहीं, क्योंकि जीनियस और पागल के व्यवहार में बहुत कम अंतर होता है।
पागल या मूर्ख की बातें औचित्यहीन, अर्थहीन होती हैं तो जीनियस की बातों में गहरा अर्थ छिपा होता है। वे एक पहेली की तरह होती हैं और उन्हें बूझने वाला ही जानता है कि सामने वाला कितना विद्वान, कितना दिमाग वाला है। इसलिए बातों के पीछे की बातों को समझने का प्रयास करना चाहिए। कहते हैं जीवन भी एक पहेली की तरह होता है।

इसमें कदम-कदम पर नई-नई पहेलियाँ सामने आती हैं। जो इन पहेलियों को समझदारी के साथ, सावधानी के साथ, होशियारी के साथ, सूझ-बूझ से बूझता जाता है, हल करता जाता है, वह सफलता रूपी फल को पाकर आगे बढ़ता जाता है। जो इन पहेलियों को तेजी से हल कर लेता है वह जीवन में तेजी से आगे बढ़ता है और जो इन्हें हल करने में समय लगाते हैं, वे उसी गति से आगे बढ़ते हैं।

इसके साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में बहुत-सी बातें आपके सामने ऐसी आती हैं, इस तरह कहीं जाती हैं कि जिनके अर्थ आप समझ नहीं पाते। ऊपर से उनका अर्थ कुछ और होता है और छिपा अर्थ कुछ और। जो लोग छिपे अर्थ या 'बिट्वीन द लाइन्स' को पढ़ लेते हैं, पढ़ना जानते हैं, वे समझदार होते हैं, सफल होते हैं। और जो नहीं जान पाते, पढ़ पाते, वे अज्ञानी होते हैं, असफल होते हैं और गलत अर्थ समझकर सदा परेशान होते रहते हैं।

यदि आपको भी बातों के गूढ़ अर्थ समझ नहीं आते तो इन्हें समझने का तरीका यही है कि आपसे जो बात कही गई है, उसको घुमा-फिराकर अलग-अलग पहलू से समझने की कोशिश करें। इसके लिए दिमाग लड़ाएँ, दिमाग दौड़ाएँ, दिमाग खपाएँ। यकीन मानिए, आपकी दिमागी कसरत जरूर रंग लाएगी यानी आप समझ जाएँगे, समझने लग जाएँगे कि सामने वाला आपसे आखिर कहना क्या चाहता है।

और अंत में, आज 'पज़ल डे' है। आज के दिन तय करें कि जीवन में चाहे कितनी बड़ी पहेली, कितनी बड़ी पज़ल आपके सामने आ जाए, आप उसे हल करके ही, बूझकर ही दम लेंगे। उससे पज़ल्ड या परेशान नहीं होंगे। यदि आप ऐसा करते रहेंगे तो सफलता की हर सीढ़ी चढ़ते जाएँगे और खुद दूसरों के लिए एक पहेली बन जाएँगे। और नहीं तो एक पहेली बनकर रह जाएँगे। अरे भई, ये मुर्गी पहले आई या अंडा!
लेखक के बारे में
मनीष शर्मा