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Written By मनीष शर्मा

खुद को बचाना है तो बचाओ पानी

‍यु‍धिष्‍ठिर
द्वैतवन में रहने वाले एक ब्राह्मण की शमी लकड़ियाँ एक हिरण ले भागा। ब्राह्मण ने उसी जंगल में रह रहे पांडवों से उन्हें वापस लाने की गुहार लगाई। उसकी बात सुनकर वे हिरण की तलाश में निकल गए। बहुत दूर जाने पर उन्हें हिरण नजर आया।

सभी उसके पीछे भागे लेकिन उसे पकड़ नहीं पाए। तब वे थक-हारकर एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। सभी प्यासे थे। युधिष्ठिर के कहने पर नकुल ने पेड़ पर चढ़कर पता लगाया कि पास ही कोई तालाब है। वह अपने भाइयों के लिए तालाब से पानी लाने के लिए चल दिया। वहाँ पहुँचकर वह पानी पीने के लिए झुका, तभी एक आकाशवाणी हुई- ठहरो! यह मेरा जलाशय है।

यहाँ तुम मेरे प्रश्नों का सही-सही उत्तर देकर ही जल पी सकते हो। नकुल ने उस पर ध्यान नहीं दिया और जल पी लिया। जल पीते ही उसके प्राण निकल गए। इसके बाद युधिष्ठिर की आज्ञा से सहदेव, अर्जुन और भीम भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने भी वही गलती की। अंत में युधिष्ठिर आए।

अपने भाइयों को मृत देखकर वे दुखी हो गए। उन्होंने सभी को ध्यान से देखा तो किसी के शरीर पर शस्त्र प्रहार का कोई निशान नहीं था। वे राज का पता करने के लिए तालाब में उतरे। तभी वही आवाज गूँजी- ठहरो! मैं जलाशय का स्वामी बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे भाइयों का वध किया है, क्योंकि उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर दिए बिना जल पीने का दुस्साहस किया था।

युधिष्ठिर- एक बगुला मेरे भाइयों का वध नहीं कर सकता। सच-सच बताओ तुम कौन हो? तभी उनके सामने एक यक्ष प्रकट हुआ। युधिष्ठिर
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उसके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तैयार हो गए। तब यक्ष ने उनसे एक-एक कर कई प्रश्न पूछे और युधिष्ठिर ने उन सभी के सही उत्तर दे दिए। इस पर यक्ष ने प्रसन्न होकर उनके सभी भाइयों को जीवित कर दिया। सभी ने जी भरकर पानी पिया।

दोस्तो, आगे बढ़ने से पहले आपको भी हमारे एक प्रश्न का उत्तर देना होगा कि आज की कहानी में से हम किस विषय पर चर्चा करेंगे? क्या बात है! बिलकुल सही पहचाना। जी हाँ, आज हम पानी की ही बात करेंगे, जो आज आपके घर, मोहल्ले, गाँव, शहर, देश की ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की समस्या बन चुका है। पानी का घटता स्तर आज विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।

पानी को लेकर गली-मोहल्लों के रोजमर्रा के झगड़ों की तो छोड़ो, कुछ विद्वानों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि यदि अगला विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी को लेकर ही होगा। लेकिन विडंबना यह है कि कोई इसकी गंभीरता को नहीं समझ रहा। यदि यही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम पानी के लिए तरसेंगे। तब हमें समझ में आएगी पानी की कीमत।

क्या जल के बिना हमारा जीवन संभव है। कैसे संभव है। हमारे शरीर का सत्तर प्रतिशत भाग जिस जल से बना हो उसकी कमी हमारा शरीर कैसे सह पाएगा। जब पानी के सीमित स्रोतों पर यक्ष जैसे लोग कब्जा जमाकर बैठ जाएँगे और हम बिना पानी पिये ही प्राणहीन होकर गिरेंगे, तब कोई युधिष्ठिर हमें बचाने नहीं आएगा। है न कितनी डरावनी बातें, लेकिन हम इन बातों पर सोचते ही कहाँ हैं।

हम तो बस अपनी-अपनी में ही लगे हैं। जबकि यह भी तो अपनी ही समस्या है। कहते हैं कि कुआँ सूखने पर ही पता चलता है पानी का महत्व। जिस दिन एक बाल्टी पानी भी मिलना बंद हो जाएगा, तब हमें पता चलेगी स्थिति की गंभीरता।

इससे बेहतर है कि हम पहले ही सँभल जाएँ और सभी मिलकर अपने-अपने तरीके से जल संरक्षण करें। मानसून दस्तक दे चुका है। हमें वर्षा जल के संग्रहण की दिशा में मिलकर प्रयास करना चाहिए क्योंकि जब पानी बचेगा तभी हम बचेंगे।

और अंत में, आज निर्जला एकादशी है। आज के दिन व्रत करने वाले जल ग्रहण नहीं करते। असल में इस त्योहार का भाव यही है कि जल का मूल्य समझो और इसका संरक्षण करो।

यदि हम सब मिलकर इस अभियान में जुटेंगे तो जैसे बूँद-बूँद से सागर बनता है, वैसे ही हम सभी की सम्मिलित कोशिशें पानी के स्तर को इंच-इंच ऊपर ले आएँगी। तब आपको दस फुट पर ही पानी मिल जाएगा। कितना अच्छा लगता है न सुनकर। तो फिर देरी क्यों। खुद को बचाने के लिए पानी को बचाने के अभियान में आज से ही जुट जाएँ। अरे भई, पानी सिर से ऊपर जा चुका है, अब तो चेत जाओ।
लेखक के बारे में
मनीष शर्मा