ड्रामा फेस्टिवल को क्यों सजाता है फिल्मों का आर्ट डायरेक्टर?

में फिल्म-टीवी की बड़ी संभावनाएं 
दिल्ली में भारंगम के साथ के कला परिदृश्य को लेकर भी ज़िक्र चला। जंयत कहने लगे , भोपाल में फिल्म और टेलीविज़न के काम की काफी संभावनाएं हैं। काफी लोकेशन्स हैं।1993 में अनीता देसाई के नॉवल पर बनी फिल्म ‘इन कस्टडी’ जैसी फिल्मों से यह सिलसिला शुरू हुआ था। उसके बाद मैंने विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ से ए काम शुरू किया। ‘मकबूल’ के बात प्रकाश झा की सारी फिल्में मैंने भोपाल में ही की। उसके बाद रूमी जाफ़री की फिल्म ‘गली-गली में चोर’है की। अभी एक और फिल्म करने जा रहा हूं। मुंबई में अक्सर फिल्म डायरेक्टर्स से कहता हूं, भोपाल में लोकेशन है, चलो देखते हैं। इसका असर यह हुआ है कि काम लगातार हो रहा है। भोपाल में फिल्म का एक कल्चर बन गया है। आर्टिस्ट की भी कमी नहीं है। भोपाल में भारत भवन, रंगमंडल के बंद होने के बाद शौकिया थिएटर के समूहों ने बहुत काम किया।
भारत भवन, रंग मंडल का था बड़ा नाम  
1982 से 1991 तक जयंत रंग मंडल के कलाकार रहे। उस दौर को याद करते हुए कहने लगे, ‘मेरा यह मानना है कि जब भोपाल में रेपेटरी ज़िंदा थी, पूरे हिंदुस्तान में हम ड्रामा शोज़ लेकर घूमते थे। तब के उस रंगमंडल का एक प्रभाव था। लोग पूछते थे कि रंग मंडल का प्ले अब कब आ रहा है। अभी मुश्किल है कि वो हैपनिंग का दौर निकल गया। वो हिंदी थिएटर के लिए बड़ा नुकसान हुआ है। वहां दुनिया के बड़े डायरेक्टर्स आते थे। बड़े प्लेज़ वहां देखने को मिलते थे। सबकुछ बंद हो गया। हमारे रंग मंडल के लोग अब अपना ग्रुप बनाकर अपना काम कर रहे हैं। मगर पहले रेपटेरी होने की वजह से एम्योचोर नाट्य समूहों के सामने भी एक चुनौती रहती थी। वो खुद काफी सीखते थे, बेहतर करने की कोशिश करते थे। अब आपके सामने कोई है नहीं।'
एमपी का ड्रामा स्कूल बनाए आत्मनिर्भर 
भोपाल में अब मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय चल रहा है, उसका कोर्स एक साल का है लेकिन एक साल के कोर्स के बाद ड्रामा स्कूल का सर्टिफिकेट लेकर आर्टिस्ट जाएगा कहा, इसकी अभी तक कोई योजना नहीं है। आपने तो सर्टिफिकेट दे दिया। अब स्टूडेंट के सामने मुंबई या कहीं और संघर्ष करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यह बेहद चिंता की बात है कि थिएटर का एजुकेशन आपको आत्मनिर्भर नहीं बना रहा है। बहुत एक्सट्रॉ ऑर्डनरी वर्क के बाद दो चार नाम निकल पाते हैं। मगर ज़्यादातर लोग गुम हो जाते हैं। मेरे विचार में थिएटर का एजुकेशन ऐसा होना चाहिए कि एक स्टुडेंट डिग्री पाने के बाद जीविका चला सके। 
रहा सवाल थिएटर का तो हमें इस बात का रोना बंद करना पड़ेगा कि थिएटर ग़रीब है। पैसा नहीं है। इसे बड़ा और अमीर बनाने के लिए आपको नए तरीके ढूंढना चाहिए। हम कैसे इसको मिडिल क्लास और फिर उससे और ऊपर ले जाएंगे। यह सोचना होगा। कहने लगे, जब मुंबई के काम से जी भर जाएगा, एमपी में थिएटर करने आ जाऊंगा। रायपुर,भोपाल,इंदौर में। जयंत रायपुर में पत्रकारिता कर चुके हैं। उनके इंदौर के ज़िक्र पर याद आया, इंदौर में सीनियर थिएटर आर्टिस्ट प्राजंल क्षोत्रिय टेरस थिएटर चला रहे हैं।  हाल ही में प्रांजल के टेरेस थिएटर में जब मैं एक शो देखने पहुंचा, तब उन्होंने मुझे बताया था कि अपनी इंदौर यात्रा के दौरान जयंत उनके बनाए टेरेस थिएटर को देखने आए थे। देखकर वो बेहद खुश हुए। कहने लगे, मैं जल्द ही इंदौर आकर एक ड्रामा डायरेक्ट करूंगा। 
 
सरकारी मदद से नहीं चलेगा थिएटर
अभी पूरे हिंदुस्तान में लोग ग्रांट ओरिएंटेड( सरकारी मदद से ) थिएटर कर रहे हैं। सरकार से जो पैसा मिल गया उसका एक शो कर दिया। उसके बाद बंद। पहले ऐसा था कि नाट्य मंडलियां तैयार कर फेस्टिवल में जाते थे। अब फेस्टिवल के लिए नाटक होता है। फेस्टिवल ख़त्म, नाटक ख़त्म। मैं भी आज सोचता हूं कि मुंबई में जो करना तो कर लिया। अब अपनी असली जगह थिएटर में क्या होगा। अब यहां विज़ुअल फेस्टिविटी दिखना चाहिए।
 
भारंगम के पोस्टर सड़क पर क्यों?
अपनी बात को और समझाते हुए जंयत बोले, मैंने के बड़े-बड़े पोस्टर एनएसडी की आऊटर वाल से सटाकर लगवाए हैं। इसके पीछे सोच यही है कि थिएटर का आदमी तो वैसे ही नाटक देखने आ जाएगा। सड़क पर चलता आदमी कैसे आएगा? साउथ की फिल्मों में रजनीकांत का अस्सी फीट के कटआउट और उसके दूध से स्नान को आप नकार नहीं सकते। अगर नसीर का अस्सी फीट का कटआउट लगाने से अगर दर्शक आते हैं तो लगाना चाहिए। वरना नया नसीर आएगा कहां से। पुराने नसीर को पहचानेगा कौन? 
 
फिल्म ‘आंखें 2’ में होगा आर्ट डायरेक्शन
चलते-चलते मैंने पूछा..मुंबई लौटकर कौन सी नई फिल्म करने वाले हैं..जयंत बोले..मैं अनीस बज़्मी की फिल्म ‘आंखे’ की सिक्वल के लिए भी काम कर रहा हूं। अनीस बज़्मी के लिए मैं दो फिल्में ‘सिंग इज़ किंग और वेलकम टू’ पहले कर चुका हूं।‘शक्ति’ नाम की एक फिल्म कर रहा हूं। मैंने पूछा..बीस साल से आप मुंबई में है, पहले और आज की लाइफ़ स्टाइल में क्या बदलाव आया है..मुस्कुराते हुए जयंत ने कहा, पहले और आज की लाइफ में कोई फर्क नहीं आया है। वही सुबह सैट पर ग्यारह बजे पहुंचकर रात ग्यारह बजे लौटने वाली ज़िदंगी है। यह करना ही पड़ता है। हर दिन नया वन टू वन। इसके अलावा कोई रास्ता ही नहीं है।  
(इंदौर-ग्वालियर रंगमंच से जुड़े रहे शकील अख़्तर वरिष्ठ पत्रकार हैं। दस सालों से इंडिया टीवी, नोएडा में बतौर सीनियर एडिटर सेवाएं दे रहे हैं) 
सभी तस्वीरें : जासमीन शर्मा, दिल्ली।



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