इंडियाज मोस्ट वाण्टेड के बारे में अर्जुन कपूर ने बताईं खास बातें

"जैसी फिल्म बनाने के लिए जो रिसर्च की ज़रुरत थी वो पहले ही राजकुमार गुप्ता (फिल्म निर्देशक) ने कर ली थी। उन्होंने तीन साल तक रिसर्च की और फिर सही समय पर फिल्म बनाने के लिए इंतज़ार भी किया। जब मैं फिल्म से जुड़ा तो मेरी रिसर्च के लिए भी उन्होंने ही तैयारी कर के रखी। मैं कुछ इंटेलिजेंस ब्यूरो के ऑफिसर से मिला। ये वो लोग नहीं हैं, जिनकी हम कहानी कह रहे हैं,
लेकिन इनसे मिल कर मुझे इन ऑफिसर्स के बारे में जानकारी हासिल हुई।" की फिल्म 'इंडियाज मोस्ट वाण्टेड' रिलीज हुई है जिसमें अर्जुन कपूर का अलग अंदाज़ है। सच्ची घटना पर यह फिल्म आधारित है।

वेबदुनिया संवाददाता से बात करते हुए अर्जुन ने कहा, "जब भी हम इंटेलिजेंस ब्यूरो के ऑफिसर या एजेंट्स की बात करते हैं, तो लगता है कि जेम्स बॉण्ड होगा या मिशन इम्पॉसिबल जैसी फ़िल्मों की याद आती है, ना कि ख़ालिस भारतीय ऑफिसर्स की जो ख़ाकी रंग की शर्ट पहन कर आम लोगों जैसे रहते हैं। ये लोग आम लोगों में घुलमिल जाते हैं। ये 9 से 5 बजे वाला काम करते हैं। इतने गुपचुप तरीके से काम करते हैं कि आसपास के लोगों को भी मालूम नहीं चलता। ये लोग जानकारी इकट्ठा करते हैं। इनमें न कोई अकड़ नहीं होती और न ही ये गुस्से में सिर दीवार पर मार देने वाले शख्स होते हैं। ये लोग आतंकवादी गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करते हैं ताकि कोई ऐसा हादसा होने वाला हो तो पहले ही उसे रोक दें।

गुरिल्ला वॉर सुना था, ये गुरिल्ला शूट क्या होता है?
फिल्म के निर्देशक राजकुमार चाहते थे कि हम बहुत आम से लोग प्रतीत हों। कहीं कोई हीरोइज़्म ना हो, तो हमारी बॉडी लैंग्वेज या कपड़े भी आम से होने चाहिए। इस तरह के लिबास में हम पाँच लोग एक स्कॉर्पियो में बैठ कर जहां शूट करना है वहां जाकर शूटिंग कर लेते थे और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं होती थी। ये ही हमारी गुरिल्ला शूट है।

फिल्म में काम करने के पहले आप इस गिरफ़्तारी से कितना वाकिफ थे?
बहुत नहीं। इतना जानता था कि ऐसे सीरियल ब्लास्ट हुए थे, लेकिन सबसे बुरी बात हमारे साथ ये भी है कि ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है। आपकी यादें धीरे-धीरे धुँधली होने लगती हैं। का तो नाम भी नहीं जानता था। जब फिल्म करना आरंभ किया तब बातें याद आती गईं। इस ब्लास्ट के समय मैं कहां था? क्या कर रहा था? कैसे कुछ ऑफिसर्स ने पटना और नेपाल जाकर देश के मोस्ट वांटेड क्रिमिनल में से एक को पकड़ा।

यासीन भटकल के बारे में क्या कहेंगे?
मेरा खून खौलता है यासीन भटकल के नाम से। हमने फिल्म में ये नाम इस्तेमाल नहीं किया और ना ही ज़िक्र किया है क्योंकि फिल्म इसे पकड़ने वालों पर बनाई गई है। मुझे बुरा लगता है कि कोई कैसे 400 लोगों को मार देता है और उसकी ट्रायल अभी भी चल रहा है। वह कहता है कि वह निर्दोष है जबकि सारे सबूत उसके खिलाफ हैं। कभी-कभी सोचता हूँ कि जिन 400 लोगों को उसने मारा उसके घरवाले जब सुनते होंगे कि यासीन भटकल कहता है कि वो निर्दोष है तो उन घरवालों पर क्या गुज़रती होगी? लेकिन क्या करें ये हमारे देश की न्याय प्रणाली है कि हर एक को अपना पक्ष रखने की और अपने आप को निर्दोष कहने मौका मिलता है। हमारा देश तो दुश्मनी भी बहुत तमीज़ से निभाता है।

 

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