सरदार उधम : 21 सालों के संघर्ष और पीड़ा का दस्तावेज है यह फिल्म

सरदार उधम फिल्म नहीं है, यह इतिहास में भूला दिए गए 21 सालों की एक ऐतिहासिक कृति है। शूजित सरकार और विक्की कौशल ने इस ऐतिहासिक गाथा को जिस शिद्दत से जिया है वो कमाल है।

Author संदीपसिंह सिसोदिया| Last Updated: गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021 (14:57 IST)
पंजाब के अमृतसर का जलियांवाला बाग, जिसकी खून से सनी मिट्टी को जेब में रख भगतसिंह फांसी झूल गए, जिसकी चीत्कारों ने सिंह को 21 साल सोने नहीं दिया। इसके हिस्टोरिकल बैकग्राउंड में बनने वाली किसी भी फिल्म, खासतौर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर बायोपिक बनाना बेहद मुश्किल और लंबा काम है।


यह फिल्म नहीं, भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की विचारधारा का विवरण है, युवा क्रांतिकारियों के वैचारिक स्तर को समझने की एक उम्दा कोशिश है। इसके संवाद बताते हैं कि एक आंदोलनकारी, रिवॉल्यूशनरी और आतंकी में क्या फर्क होता है। हिंसा के बैकग्राउंड पर बनी इस फिल्म में साफ किया गया है कि उधम सिंह का मकसद पंजाब के पूर्व गवर्नर माइकल ओ डायर से निजी बदला लेना नहीं था। उनका मकसद ब्रिटिश सरकार के साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाना, भारतीयों पर होने वाले जुल्मों की कहानी दुनिया के दूसरे मुल्कों तक पहुंचाना था। इसीलिए उधम कोर्ट में कहता है 'नॉट ग़िल्टी" और डायर को मारना 'मर्डर' नहीं 'प्रोटेस्ट' है। वो मर्डरर नहीं प्रोटेस्टर है।

कहानी का कालखंड 1919 से 1940 तक का है। उधम सिंह के 21 सालों के संघर्ष और पीड़ा का दस्तावेज है यह फिल्म। आजकल के फटाफट दौर में बेहद इत्मिनान और रिसर्च कर बनाई गई इस फिल्म को 163 मिनिट में समेटना बेहद मुश्किल रहा होगा। फिल्म की एडिटिंग और अन्य बारीकियों पर खास ध्यान दिया गया है। ब्रिटिश दौर के अमृतसर और लंदन को रीक्रिएट करने से लेकर उस दौर की कारें, बसें, इमारतें, रास्ते, बंदूकें और बैकग्राउंड सब इतना वास्तविक है कि बरबस दर्शकों को ब्रिटिश भारत में वापस ले जाता है। सेट डिज़ाइनिंग, कॉस्ट्यूम डिज़ाइनिंग के लिए वीरा कपूर और सिनेमैटोग्राफी के लिए अविक मुखोपाध्याय ने कमाल कर दिया है।

इस फिल्म की कई लोग स्लो पेस और डिप्रेस्ड थीम के कारण आलोचना कर रहे हैं, लेकिन 21 वर्षों से असहनीय दर्द और ट्रामा से जूझ रहे इंसान के सफर को इससे अलग नहीं दिखाया जा सकता था। फिल्म में कई बार ठहराव आता है। इंटेलिजेंट और रिएलिस्टिक सिनेमा में लंबे पॉज होते हैं दरअसल वे दर्शकों से डायरेक्ट कनेक्ट करते हैं। इस ठहराव में अक्सर दर्शक भी कहानी के बारे में सोचता है।



जलियांवाला बाग हत्याकांड को यूं तो कई फिल्मों में दिखाया-सुनाया गया है लेकिन जिस तरह से इस फिल्म में इसे दिखाया गया है वो आपको सीधे उसी काल, उसी पल में लाचार, निर्दोष भीड़ का हिस्सा बना देता है। निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसते देख आप सुन्न हो जाते हैं। इस घटना के ऑफ्टर शॉक को जिस संवेदना और गहराई के साथ शायद ही पहले कभी पेश किया गया हो। लाशों से पटे हुए जलियांवाला बाग के दृश्यों को जिस विस्तार और बारीकी से दिखाया गया है, उससे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस सीन की डिटेलिंग और बैकग़्राउंड साउंड खौफनाक समां बना देती हैं।

लाशों के ढेर के बीच जीवित लोगों को खोजना और कराहते घायलों को ठेले पर रखकर ले जाना, खून से लथपथ बच्चों-महिलाओं का पानी मांगते हुए तड़पना, लाशों उठाते हुए उधम का थककर चूर होने पर भी फिर से उठ कर मदद करना और अस्पताल में जान बचाने के लिए जद्दोजहद के बीच कर्फ्यू लगा होने की वजह से इलाज ना मिलना... यह सारे दृश्य अवसाद, बेबसी, गुस्से और भावुकता का ऐसा कैनवास रचते हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी काफी देर तक दिमाग पर तारी रहता है।

ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार और गुलाम भारतीयों के कुछ न कर पाने की कसमासाहट, यह सब हमें अंदर तक झकझोर देता है। लाशों से अटे पड़े जलियांवाला के एरियल सीन में हमें कोई हिंदु, मुस्लिम या सिख नहीं, सिर्फ पार्थिव शरीर दिखाई देते हैं। यह पिक्चराइजेशन से कब रिएलाइजेशन बन जाता है, हमें पता भी नहीं लगता।



जनरल डायर की भारतीय लोगों को 'सबक' सिखाने के लिए की गई फायरिंग और उस घटना की जांच के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों में गोरे साहब होने का दंभ साफ नज़र आता है। ब्रिटिश गवर्नर माइकल ओ डायर और जनरल डायर को जलियांवाला बाग नरसंहार पर कोई पछतावा नहीं है। एक दृश्य में माइकल ओ डायर द्वारा अफ्रीका और भारत जैसे मुल्कों को 'बर्डन ऑफ व्हाइटमैन' बताना और उन पर शासन करना अपना कर्तव्य मानना जैसे बयानों से फिल्म में घृणित उपनिवेशी सोच, रंगभेद और नस्लवादी सर्वोच्चता के गुरूर को दर्शाया गया है।

इस फिल्म में कई प्रसंगों में 'बिटविन द लाइन' के जरिए कई तत्कालीन बातों के जवाब भी मिल जाते हैं। जैसे फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद जब एलीन पामर (कर्स्टी एवर्टन) उधम से माफीनामा लिखने को कहती है कि इससे उसे जीवनदान मिल जाएगा तो उधम का जवाब इतिहास के कई चर्चित 'माफीनामों' की हकीकत उधेड़ कर रख देता है। फिल्म में कई दृश्यों में खामोशी का बेहतरीन इस्तेमाल है। ऐसे ही एक दृश्य में जब उधम जनरल डायर की कब्र पर जाता है
तो ने सिर्फ आंखों और चेहरे के भावों के ज़रिए ऊधम के गुस्से, बेबसी और दर्द को बखूबी दिखाया है।

सरदार उधमसिंह फिल्म नहीं है, यह इतिहास में भूला दिए गए 21 सालों की एक ऐतिहासिक कृति है। इसे मैं 'रिचर्ड एटनबरो की गांधी' की समकक्ष कहूंगा। शूजित सरकार और विक्की कौशल ने इस ऐतिहासिक गाथा को जिस शिद्दत से जिया है वो कमाल है। आने वाले समय में इसे भारतीय सिनेमा का वर्ल्ड-क्लास मास्टरपीस माना जाएगा। सरदार उधम सिंह को नि:संदेह भारत की ऑस्कर एंट्री होनी चाहिए। अभी तक हमें जलियांवाला बाग हत्याकांड पर ब्रिटिश सरकार से कोई अधिकारिक माफीनामा नहीं मिला है। ऑस्कर से शायद हमें भारत पर हुए उपनिवेशी जुल्मों की स्वीकारोक्ती (पावती) ही मिल जाए।



और भी पढ़ें :