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दुनिया के बारे में चार रोचक बातें जो आप शायद नहीं जानते

Updated: सोमवार, 19 नवंबर 2018 (11:56 IST)
हमारी दुनिया के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो हमारे ज़हन में इस कदर बस गई हैं कि हम उनके बारे में कभी सवाल नहीं करते। हम मान लेते हैं कि जो हम जानते हैं वो सही होगा। लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं।
 
 
दुनिया से जुड़े तथ्यों के बारे में लिखने वाले वैज्ञानिक मैट ब्राउन अपनी किताब "एवरीथिंग यू नियू अबाउट प्लानेट अर्थ इज़ रॉन्ग" (धरती के बारे में जो भी आप जानते हैं वो ग़लत है) में ऐसी कुछ बातों का ज़िक्र करते हैं जो आपको अपनी जानकारी पर सवाल करने के लिए बाध्य कर देते हैं। उन्होंने दुनिया के बारे में बीबीसी के साथ चार रोचक बातें साझा कीं।


1. 2060 वर्ग किलोमीटर का नो मैन्स लैंड
ज़मीन, समुद्र तट, ताक़त और व्यवसाय को लेकर आपस में लड़ने वाले देशों के बीच पृथ्वी पर कई जगह 'नो मैन्स लैंड' होने की जानकारी आपको होगी। अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार ये दो देशों की सीमाओं के बीच का खाली इलाक़ा होता है जिसे कोई भी देश क़ानूनी तौर पर नियंत्रित नहीं करता है। हालांकि इस पर क़ानूनी दावा किया जा सकता है।
 
 
लेकिन अफ्रीका में एक जगह है जिस पर कोई भी देश अपना अधिकार नहीं चाहता। बीर ताविल नाम का ये इलाक़ा 2,060 वर्ग किलोमीटर का है और मिस्र और सूडान की सीमाओं के बीच है। ये इलाक़ा 20वीं सदी की शुरुआत में अस्तित्व में आया जब मिस्र और सूडान ने अपनी सीमाएं कुछ इस तरह से बनाईं कि ये इलाक़ा दोनों में से किसी का भी नहीं रहा।
 
बीर ताविल सूखाग्रस्त इलाक़ा है और यहां की ज़मीन बंजर है। लिहाज़ा इस पर दावा कोई नहीं करना चाहता। लेकिन इस इलाक़े ने कई लोगों को अपनी तरफ आकर्षित भी किया है। 2014 में अमेरिका के वर्जीनिया के एक किसान ने यहां एक झंडा लगा कर खुद को "उत्तरी सूडान के राज्य" का गवर्नर घोषित कर दिया। उनकी चाहते थी कि उनकी बेटी राजकुमारी बने।
 
 
2. दुनिया का चक्कर लगाने वाला पहला व्यक्ति?
क्या पुर्तगाली खोजकर्ता फर्डिनेंड मैगलन दुनिया का चक्कर लगाने वाले पहले व्यक्ति थे और क्या उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े समंदर को अपना नाम दिया था?
 
 
ऐसा नहीं है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 1480 में जन्मे फर्डिनेंड मैगलन पहले यूरोपीय थे जिन्होंने प्रशांत महासागर को पार किया था। 1519 में मैगलन अपने दल के साथ समंदर के रास्ते स्पाइस द्वीप खोजने के लिए निकले थे। कई देशों से गुज़र कर आख़िर तीन साल बाद ये दल उसी जगह लौटा जहां से वो चला था।
 
 
हालांकि स्पेन से चली इस यात्रा को पूरा करने की खुशी मनाने के लिए कम ही लोग ज़िन्दा बचे थे। 270 लोगों के चालक दल के साथ शुरु हुई ये यात्रा जब ख़त्म हुई तो मात्र 18 लोग ही जीवित बचे थे। यात्रा के दौरान मैगलन की भी मौत हो गई थी। इस यात्रा के दौरान साल 1521 में मैगलन फिलीपीन्स के पूर्वी तट पर पहुंचे। वहां के मूल निवासी उन्हें सीबू द्वीप ले कर गए।
 
 
मैगलन और उनके चालक दल के सदस्य सीबू में रहने वालों के अच्छे दोस्त बन गए। इतनी गहरी दोस्ती हुई कि मैगलन अपने दोस्तों को पड़ोसी द्वीप में रहने वाले उनके दुश्मनों के आक्रमण से बचाने के लिए तैयार हो गए।
 
 
उन्होंने हमला करने की तैयारी की और टुकड़ी का नेतृत्व मैगलन ने खुद किया। लेकिन जल्द ही मैगलन घायल हो गए। उन्हें ज़हर में डूबा एक तीर लगा जिसके बाद उनकी मौत हो गई। मैगलन के साथ गए लोग स्पाइस द्वीप खोजने के बाद उसी रास्ते वापस लौटना चाहते थे लेकिन अपना रास्ता बदल कर वो छोटे रास्ते के ज़रिए स्पेन लौटे।
 
 
मैगलन ने इस रास्ते को प्रशांत महासागर कहा लेकिन इसे देखने वाले वो पहले यूरोपीय नहीं थे। सालों बाद स्पेन के खोजकर्ता वास्को नूनेज़ डी बालबोआ पनामा से होते हुए प्रशांत सागर के किनारे पहुंचे और अपनी तलवार को हवा में लहरा कर उन्होंने इसे खोजने का दावा किया।
 
 
3. समंदर के किनारे ज़मीन होती है?
हम ये मानते हैं कि पानी से भरे समंदर के दूसरे छोर का शायद पता न चल सके लेकिन इसका कम से कम एक किनारा ज़रूर होता है। कई समंदर तो चारों तरफ से ज़मीन से घिरे होते हैं, जैसा कि भूमध्य सागर और काला सागर। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सागर कहां महासागर में मिल जाते हैं पता नहीं चलता लेकिन ऐसे में द्वीपों की माला को जोड़ कर देखा जाए तो इसकी जानकारी भी लगाई जा सकता है।
 
लेकिन एक ऐसा समंदर है जिसके किसी किनारे कोई ज़मीन नहीं है। ये है सारगास्सो सागर। ये अटलांटिक सागर के पश्चिम में है और उत्तर अटलांटिक में एक तरफ को मुड़ती लहरें ही इसकी सीमा बनाती हैं। अटलांटिक की मुड़ती लहरों के कारण सारगास्सो सागर का पानी शांत रहता है।
 
 
4. रिक्टर स्केल पर मापा जाता है भूकंप?
स्कूलों में हमने यही सीखा है कि भूकंप की तीव्रता को रिक्टर स्केल पर मापा जाता है। लेकिन असल बात तो ये है कि ये पूरी तरह से सटीक जानकारी नहीं देता।
 
 
1930 में भूगर्भ विशेषज्ञ चार्ल्स रिक्टर और बेनो गुटनबर्ग ने केवल कैलिफोर्निया में भूकंप के कारण पैदा होने वाली उर्जा मापने के लिए इसे बनाया था। ये एक तरह का सिस्मोग्राफ़ था। इसी कारण 1970 में एक नई प्रणाली का ईजाद किया गया जिसे आज भूगर्भ विज्ञानी एक मानक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। इसे सिस्मोलॉजिकल स्केल कहते हैं।

 
सिस्मोलॉजिकल स्केल का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है लेकिन ये मुश्किल नाम होने के कारण इसे रिक्टर स्केल के रूप में ही लिखा जाता है। तो अगली बार जब आप रिक्टर स्केल पर 8 तीव्रता के भूकंप के बारे में कहीं पढ़ें तो ये जान लें कि इसका मतलब सिस्मोलॉजिकल स्केल से है।
 

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