विजय रुपाणी का इस्तीफ़ा अचानक नहीं है, क्या है सबसे बड़ी वजह?

Last Updated: रविवार, 12 सितम्बर 2021 (07:36 IST)
प्रदीप कुमार, बीबीसी संवाददाता
पिछले महीने विश्व आदिवासी दिवस यानी नौ अगस्त के मौके पर भरूच के राजपीपला में आयोजित समारोह में के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी आत्मविश्वास से भरे नज़र आ रहे थे।
 
हालांकि सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा शुरू हो चुकी थी कि भारतीय जनता पार्टी गुजरात में समय से पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा के साथ चुनाव करा सकती है।
 
इसी पहलू पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में विजय रुपाणी ने मीडिया से कहा कि 'मैं नहीं मानता कि गुजरात में जल्दी चुनाव होंगे, हम लोग लगातार काम करने वाले लोग हैं। भाजपा कभी चुनाव को नज़र में रख काम नहीं करती।'
 
समय से पहले चुनाव कराने की चर्चा के साथ साथ राज्य में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा भी ज़ोर पकड़ने लगी थी, यह चर्चा इतनी ज़्यादा बढ़ गई थी कि बीते 15 अगस्त को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटील को सार्वजनिक तौर पर बयान देना पड़ा कि 'रुपाणी साब नहीं बदले जाएंगे और पार्टी उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी।'
 
ज़ाहिर है राजनीति में कहते हैं कि कयासबाज़ी का दौर भी हवा में नहीं उठता, इसकी एक झलक 11 सितंबर, 2021 को तब दिखी, जब विजय रुपाणी के सुर बदले हुए नज़र आए। लगातार काम करने की बात कहने वाले विजय रुपाणी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद कहा, "समय के साथ दायित्व बदलते रहते हैं।"
 
उन्होंने जो अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा उसमें यह भी कहा, "गुजरात की विकास की यह यात्रा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक नये उत्साह के साथ, नए नेतृत्व के साथ आगे बढ़नी चाहिए, इसे ध्यान में रखकर मैंने त्यागपत्र दिया है।''
 
उत्तर प्रदेश में मार्च, 2022 से पहले चुनाव होने हैं जबकि गुजरात में दिसंबर, 2022 से पहले चुनाव होने हैं। ऐसे में बीजेपी का आलाकमान चाहे तो दोनों राज्यों में एक साथ चुनाव संभव है। कयास यही है कि आने वाले चुनाव को देखते हुए ही पार्टी ने रुपाणी को हटाने का फ़ैसला किया है।
 
बीबीसी गुजराती सेवा के संपादक अंकुर जैन कहते हैं, "तय समय से हों तो भी एक साल बाद गुजरात के चुनाव होंगे और मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा पिछले कुछ दिनों से होने लगी थी। रुपाणी कभी मास लीडर नहीं रहे।''
 
''2024 से पहले कोई चुनाव मोदी सरकार के लिए लिटमस टेस्ट जैसा है और बीजेपी आलाकमान गुजरात में किसी भी सूरत में चुनाव गंवाना नहीं चाहेगा। यही वजह है कि चेहरा बदला गया है।"
 
नरेंद्र मोदी-अमित शाह के प्रदेश में हलचल क्यों?
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह गुजरात से ही हैं। बावजूद इसके पिछले कुछ समय से गुजरात में बीजेपी की चिंताएं लगातार बढ़ रही थीं। इसको लेकर नेतृत्व परिवर्तन के लिए भी दबाव बढ़ रहा था।
 
इस बारे में गुजराती अख़बार समूह संदेश के कार्यकारी संपादक अजय नायक बताते हैं, "रुपाणी जी को भी अंदाज़ा था कि वे अब लंबे समय तक पद पर नहीं रहेंगे, क्योंकि पिछले कुछ समय से उनकी चुनौती बढ़ रही थीं। राज्य में पाटीदार समुदाय की नाराज़गी सबसे बड़ी वजह थी।''
 
''इसके अलावा जिस तरह से पाटीदार समुदाय के बीच आम आदमी पार्टी ने सेंध लगाई थी, उसको लेकर भी चिंताएं बढ़ रही थीं। जन संवेदना यात्रा के दौरान भी आम लोगों की काफ़ी नाराज़गी दिखी थी।"
 
गुजरात की राजनीति पर नज़र रखने वालों को इसका अंदेशा तभी से होने लगा था जब चंद्रकांत राव पाटील को जुलाई, 2020 में गुजरात का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था।
 
पाटील 2019 में सूरत के नवसारी से रिकॉर्ड 6।89 लाख मतों से चुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचे थे, जबकि 2014 में भी उन्होंने पांच लाख से ज़्यादा मतों से जीतने का करिश्मा दिखाया था।
 
सूरत में पाटीदार समुदाय का प्रभुत्व है और इस समुदाय के नाराजगी और आंदोलनों के बीच में सीआर पाटील की ज़ोरदार जीत ने यह दर्शाया कि पाटीदार समुदाय पर उनकी पकड़ अच्छी है, लेकिन गुजरात की राजनीति को नज़दीक से देखने वाले लोगों के मुताबिक पाटील की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि उनके नरेंद्र मोदी से पुराने और सीधे संबंध हैं।
 
'ढीले ढाले' सीएम थे रुपाणी
राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस समूह के गुजराती दैनिक समकालीन के पूर्व संपादक हरि देसाई बताते हैं, "सीआर पाटील को प्रदेश अध्यक्ष बनाया ही इसलिए गया था क्योंकि राज्य में सगंठन से लेकर सरकार तक सबकुछ ढीला ढाला चल रहा था। उनको लेकर एक तरह से संगठन में जान फूंकने की कोशिश की गई थी।"
 
वहीं अजय नायक कहते हैं, "पिछले कुछ समय से संगठन और सरकार में तालमेल का काफ़ी अभाव दिखा था। प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटील और मुख्यमंत्री के बीच आपसी तालमेल उस तरह का बन नहीं पाया था और एक दूसरे से अनबन वाली स्थिति उभर आयी थी।"
 
सीआर पाटील को गुजरात के वैसे प्रभावी नेता के तौर पर देखा जाता रहा है जिन्हें नरेंद्र मोदी से मुलाकात के लिए किसी और से अनुमति नहीं लेनी होती है। ऐसे में बहुत संभव है कि विजय रुपाणी को हटाने का फ़ैसला उनके फ़ीडबैक के आधार पर लिया गया हो।
 
गुजरात की राजनीति में पाटीदार समुदाय सबसे प्रभावी माना जाता है। यह समुदाय राज्य विधानसभा की 182 सीटों में 71 सीटों पर निर्णायक साबित होता रहा है और पूरे राज्य में करीब 15 प्रतिशत मतदाता इस समुदाय के हैं।
 
गुजरात का पाटीदार समुदाय (उत्तर भारत का कुर्मी समुदाय, महाराष्ट्र का पाटील समुदाय) परंपरागत तौर पर भारतीय जनता पार्टी का वोटर रहा है।
 
लेकिन पिछले कुछ सालों में इस समुदाय के लोग बीजेपी से नाराज़गी ज़ाहिर करते रहे हैं, पहले तो हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदारों ने बड़ा विरोध किया, जिसके चलते पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था। लेकिन पिछले कुछ समय से आम आदमी पार्टी पाटीदारों में बेहद लोकप्रिय हो रही थी।
 
सूरत के बड़े कारोबारी महेश सावानी ने जून में आम आदमी पार्टी ज्वाइन की थी और उसके बाद पाटीदार आंदोलन के एक बड़े नेता नरेश पटेल ने केजरीवाल को गुजरात में बीजेपी का विकल्प घोषित कर दिया।
 
इन सबको लेकर बीजेपी पर रुपाणी को बदलने का दबाव बढ़ रहा था। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद सीआर पाटील ने आम लोगों की नाराज़गी को दूर करने के लिए राज्य सरकार के सभी मंत्रियों को बीजेपी मुख्यालय में हर सप्ताह बैठक करके लोगों की समस्याओं को सुनने का अनुरोध किया था।
 
सरकार और संगठन के बीच आपसी तालमेल का ऐसा अभाव था कि महज तीन-चार मंत्री ही इसके लिए बीजेपी कार्यालय पहुंचे और माना गया कि इस पहल में विजय रूपाणी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली।
 
हरि देसाई बताते हैं, "विजय रुपाणी कोई पावरफुल मुख्यमंत्री तो थे नहीं। उनकी इसी ख़ासियत ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था और आज इसी वजह से उन्हें हटाया गया है। लेकिन हक़ीक़त यही है कि सरकार से लेकर संगठन तक में उनकी कोई पकड़ नहीं थी।"
 
अमित शाह के क़रीबी
सरकार के ढीले रवैए और कोरोना के बाद की मुश्किल परिस्थितियों के बीच आम लोगों में सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ रहा था और सरकारी अधिकारी मंत्रियों की अनसुनी भी करने लगे थे।
 
इसकी वजह बताते हुए बीबीसी गुजराती के संपादक अंकुर जैन बताते हैं, "रुपाणी को जब राज्य की कमान थमाई गई थी तब पाटीदारों का आरक्षण आंदोलन चल रहा था। उस वक्त पार्टी के लिए गैर प्रभावी समुदाय का मुख्यमंत्री चाहिए था जो सबको खुश रख सके। जैन बनिया समुदाय के रुपाणी उसमें फ़िट साबित हुए थे। लेकिन नेताओं और अधिकारियों को पता था गुजरात सरकार के फ़ैसले कहां से हो रहे हैं।"
 
वैसे सच्चाई यही है कि विजय रुपाणी को हमेशा गुजरात में अमित शाह का क़रीबी नेता माना गया।
 
आनंदी बेन पटेल के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की स्थितियों का ज़िक्र करते हुए हरि देसाई ने बताया, "जब आनंदी बेन पटेल हटीं थीं तब पूरे राज्य में नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनने को लेकर पटाखे तक फूट गए थे। लेकिन विजय रुपाणी अमित शाह के नुमांइदे के तौर पर सामने आए और उन्हें कमान मिली। क्योंकि आलाकमान भी किसी जनाधार वाले नेता को मुख्यमंत्री बनाना नहीं चाहता था।"
 
अमित शाह और विजय रुपाणी के आपसी संबंधों पर अंकुर जैन कहते हैं, "दोनों के बीच कैसे संबंध रहे हैं, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि रूपाणी के निजी सहायक शैलश मांडालिया अमित शाह के दिल्ली जाने से पहले उनके निजी सहायक थे। राजनेताओं में निजी सहायक शेयर करने का उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। लेकिन यहां ये है।"
 
बहरहाल, इन सबके बावजूद विजय रुपाणी जिस तरह झटके से गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे, उसी तरह उन्हें हटा दिया गया।
 
संघ की पाठशाला से निकले और जनसंघ के जमाने से ही राजनीति में आए विजय रुपाणी की सबसे बड़ी ख़ासियत यही रही है कि उनके विरोधी भी उन्हें सज्जन नेता मानते हैं।
 
विजय रुपाणी के साथ एक ख़ास बात यह भी जुड़ी हुई है उनका जन्म भारत के बाहर हुआ था। वो म्यांमार की राजधानी रंगून में पैदा हुए थे और उनका परिवार 1960 के दशक में राजकोट आया था।
 
रुपाणी भी अमित शाह की तरह ही स्टॉक ब्रोकर के तौर पर काम कर चुके थे और मुख्यमंत्री बनने से पहले 2011 में वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों में उनका नाम आया था।
 
कौन बनेगा अगला मुख्यमंत्री?
इस एक विवाद को छोड़ दें, तो उनका करियर बेदाग़ दिखता रहा है, लेकिन कोई बड़ी उपलब्धि भी उनके नाम नहीं दिखती। उनकी विदाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इस बार किसी पटेल नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा?
 
इसको लेकर अजय नायक संदेह जताते हैं, "जिनके नाम की चर्चा सबसे ज़्यादा होने लगे, इतिहास बताता है कि आलाकमान उसे साइडलाइन कर देता है। इसलिए फ़िलहाल यह नहीं कहा जा सकता है कि कमान किसे मिलेगी। यह भी संभव है कि आलाकमान किसी ओबीसी या फिर दलित को मुख्यमंत्री बनाए।"
 
इस राय से हरि देसाई भी इत्तेफाक़ रखते हुए कहते हैं, "मोदी जी की पहचान ही लोगों को चौंकाने की रही है। वे किसी को भी राज्य की कमान थमा सकते हैं। संघ के किसी पुराने प्रचारक को सामने लाया जा सकता है।''
 
''पाटीदारों को काउंटर करने के लिए ओबीसी का चेहरा भी आगे किया जा सकता है। मोदी जी कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन यह तय है कि इंदिरा गांधी की तरह ही सूबे की कमान किसी मज़बूत आदमी के हाथ में नहीं देंगे।"
 
लेकिन इन सबके बीच पाटीदार मतदाताओं को अपने खेमे में बनाए रखने की चुनौती भी आलाकमान के सामने होगी। पिछले चुनाव में पाटीदारों की नाराज़गी के बावजूद बीजेपी की सरकार तो बन गई थी, लेकिन इस बार बीजेपी आलाकमान दोबारा ऐसी चुनौती का सामना शायद ही करना चाहे।

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