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एग्ज़िट पोल का छाछ जरा फूंककर पीजिए

Updated: शुक्रवार, 10 मार्च 2017 (18:56 IST)
- राजेश प्रियदर्शी
 
एग्ज़िट पोल सही भी हुए हैं और ग़लत भी, लेकिन ग़लत ही ज़्यादा हुए हैं. इसका ये मतलब क़तई नहीं है कि इस बार भी वे ग़लत होंगे, कुछ घंटे इंतज़ार कीजिए, पता चल जाएगा। 
दिल्ली जैसे छोटे राज्य में 2015 में जहां बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच लगभग सीधा मुक़ाबला था वहां एग्ज़िट पोल नहीं बता पाए कि केजरीवाल इस तरह झाड़ू फेरकर 67 सीटें ले जाएंगे। इसी तरह बिहार में भी पोल-पट्टी खुल गई थी। 
 
उत्तर प्रदेश की विधानसभा दिल्ली से छह गुना बड़ी है, जटिल है और मुक़ाबला तिकोना है. इसका ये मतलब नहीं है कि यूपी के नतीजों का मोटा-मोटा अनुमान न लगाया जा सकता हो, लेकिन उसके सही होने की कोई गारंटी नहीं है। 
 
जानकार बताते हैं कि एग्ज़िट पोल के नतीजे तभी सही होते हैं जब सैंपल साइज़ (पोल में हिस्सा लेने वाले वोटरों की संख्या) पर्याप्त बड़ा हो। उसमें हर तरह के वोटरों का सही अनुपात में होना भी ज़रूरी है ताकि एक ही तरह के ढेर सारे लोगों की राय न पूछ ली जाए। हर वेरियेबल (बदलने वाले फ़ैक्टर) का ख़याल रखा गया हो. और सबसे अहम बात ये कि कितने वोट कितनी सीटों में तब्दील होंगे इसका फ़ॉर्मूला काम कर जाए। 
उत्तर प्रदेश में जहाँ लगभग 14 करोड़ वोटर हैं वहां कितने वोटर सच-सच बताएंगे कि उन्होंने किस पार्टी को वोट दिया है जिससे नतीजों का सही अंदाज़ा मिल सके? ये सवाल बहुत कठिन है। कोई भी एजेंसी लाखों में नहीं बल्कि हज़ारों की संख्या में वोटरों से बात करती है जो यूपी के मामले में कुल वोटरों के .01 प्रतिशत से भी कम होगा। 
 
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां सुबह अलग तरह के वोटर निकलते हैं, शाम को अलग तरह के। किसी बूथ पर एक ख़ास जाति की अधिक या कम आबादी पूरे सैंपल को बिगाड़ सकती है. इसी तरह अगर सर्वे करने वाले सजग न हों तो वे एक ही बूथ के बाहर एक ही कुनबे के 20 वोटरों की राय को सैंपल समझ सकते हैं जो ग़लत होगा। 
 
ऐसे में पोल करने वाली एजेंसी दिन में कितनी बार एक ही पोलिंग बूथ पर और कितने अलग-अलग पोलिंग बूथों पर जा सकती है? पिछले चुनाव के चुनिंदा बूथों के नतीजों को, ताज़ा चुनाव के उन्हीं बूथों के रुझानों से मिलाना ज़रूरी है वरना अनुमान ग़लत हो सकता है, फिर एक्ज़िट पोल का समय भी हेर-फेर कर सकता है। 
 
इसके अलावा, कितने प्रतिशत वोट का मतलब कितनी सीटें होंगी इसका अंदाज़ा कई बार बुरी तरह ग़लत हो जाता है. मसलन, 2015 में दिल्ली में 33 प्रतिशत वोट पाकर भी पार्टी 70 में से सिर्फ़ तीन सीटें हासिल कर सकी थी। 
एजेंसियाँ पिछले चुनाव के वोटों के प्रतिशत को इस बार के एग्ज़िट पोल के आंकड़ों से मिलाती हैं ताकि निष्कर्ष निकाले जा सकें, यूपी में इस बार लगभग हर सीट पर हज़ारों युवा मतदाता पहली बार वोट डाल रहे हैं इसलिए वो एक नया फ़ैक्टर हैं जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। 
 
साथ ही, उत्तर प्रदेश के चुनाव में जाति एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर है, सभी एजेंसियाँ वोटरों के जाति और धर्म का ध्यान अपने हिसाब-किताब में रखती हैं लेकिन जाति-उप-जाति, एक ही जाति के लोगों का अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रवैया भी छकाने वाली चीज़ है। 
 
कुछ पार्टियों के वोटर दूसरों के मुक़ाबले अधिक उत्साही हैं और कुछ पार्टियों के वोटर खुलकर या सच नहीं बताते, बसपा के बारे में यह बात अक्सर कही जाती है कि उसका वोटर मुखर नहीं है। 
 
कांग्रेस और सपा ने पिछला चुनाव अलग-अलग लड़ा था, इस बार मिलकर लड़ रहे हैं, ऐसे में पिछले चुनाव के आंकड़ों और इस एग्ज़िट पोल की तुलना करके सटीक निष्कर्ष निकालना टेढ़ा काम है। 
 
अगर किसी चुनाव क्षेत्र का परिसीमन हो गया तब तो एग्ज़िट पोल करने वाली एजेंसी की जान आफ़त में आ जाती है क्योंकि सारे फ़ॉर्मूले बिगड़ जाते हैं। पोल करने वाली एजेंसी का निष्पक्ष और पूर्वाग्रह से मुक्त होना तो ख़ैर सबसे अहम है ही। 
हर ज़िम्मेदार एजेंसी, पिछले चुनाव के वोट प्रतिशत, हर पार्टी को मिली सीटें, ताज़ा चुनाव में वोट प्रतिशत का स्विंग, उस स्विंग की वजह से बदलने वाली सीटों का नंबर और ग़लती की गुंजाइश जैसे सारे फ़ैक्टर्स को कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से कैलकुलेट करती है। 
 
जिस तरह कंप्यूटर में सारी डिक्शनरियाँ डाल देने के बाद भी वह सही अनुवाद नहीं कर पाता, उसी तरह अभी तक ऐसा कंप्यूटर या सॉफ्टवेयर नहीं बना है जो करोड़ों वोटरों को प्रभावित करने वाले पचासों फ़ैक्टर्स को गुना-भाग करके हर बार सही नतीजा बता दे। शुक्रवार की रात चैन से सोइए, आपकी बेचैनी से कुछ नहीं बदलने वाला। 
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