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मशरूम लेने जंगल गईं आदिवासी महिलाएं, ज़मानत करानी पड़ी

Updated: बुधवार, 11 जुलाई 2018 (11:29 IST)
- संजीव चौधरी (जबलपुर से)
 
मध्यप्रदेश में कुछ आदिवासी महिलाओं को अनधिकृत रूप से कान्हा नेशनल पार्क में दाखिल होने पर गिरफ़्तार किया गया है। बैगा जनजाति की ये महिलाएं मशरूम लेने के लिए कान्हा नेशनल पार्क में पहुंची थीं। इसके बाद उन्हें बालाघाट ज़िले की बैहर अदालत से अपनी ज़मानत करानी पड़ी।
 
 
ये घटना 6 जुलाई की है जब हिरमा बाई और सुखवंती बाई अपने गांव से लगे कान्हा टाइगर रिज़र्व की मुक्की रेंज में कान्हा के साप्ताहिक बाजार में बेचने के लिए मशरूम तोड़ रही थीं। लेकिन मशरूम तोड़ते हुए वन विभाग के अफसरों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया।
 
 
उन महिलाओं पर वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन एक्ट का उल्लंघन कर बफ़र जोन को छोड़ कोर एरिया में अवैध रूप से दाखिल होने और मशरूम लेने जाने का आरोप लगाया गया।
 
 
प्रतिक्रियाएं
महिलाओं को गिरफ्तार कर पहले वन विभाग के दफ्तर लाया गया। फिर इनका मेडिकल टेस्ट कराया गया और वहां से बैहर कोर्ट में पेश किया गया। कई घंटों की मशक्कत के बाद ये दोनों आदिवासी महिलाएं ज़मानत पर रिहा होकर अपने घर जा पाईं।
 
 
भोपाल के वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे इस घटना पर कहते हैं, "दस रुपए के थोड़े से मशरूम के लिए महिलाओं को इस तरह से गिरफ्तार करना सरासर गलत है। टाइगर और ट्राइबल का सह-अस्तित्व सरकारी कर्मचारियों की मूर्खता के कारण ख़तरे में आ गया है। यदि इसी तरह गरीब बैगा आदिवासियों को परेशान किया गया तो वे नक्सलवाद की ओर बढ़ सकते हैं।"
 
 
इस घटना पर कान्हा के फील्ड डायरेक्टर संजय शुक्ला का कहना है, "मुद्दा सामान का नहीं है और उसकी कीमत का भी नहीं है। टाइगर रिज़र्व पोचिंग के लिए बहुत संवेदनशील है। बारिश के दौरान घास भी बहुत बढ़ जाती है। मुक्की जोन में एक बाघिन अपने बच्चों के साथ इन दिनों देखी जा रही है। वन विभाग का कर्तव्य है कि किसी भी तरह न तो आदिवासी परिवारों को कोई नुकसान हो और ना ही बाघ की जान पर कोई ख़तरा बने।"
 
 
जंगल पर अधिकार
कान्हा वन क्षेत्र में वैसे तो कई एनजीओ वन विभाग के साथ मिलकर इन आदिवासी परिवारों के आर्थिक उत्थान के लिए काम कर रहे हैं। इन्हें आदिवासी आभूषण बनाना सिखाया गया है ताकि छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए उन्हें बार-बार जंगल में अनधिकृत प्रवेश ना करना पड़े।
 
 
लेकिन अब भी आदिवासियों में जागरूकता की कमी के चलते ये जंगलों में प्रवेश करते रहते हैं। कई बार तो वो ये भी भूल जाते हैं कि वे बफ़र जोन में हैं या कोर एरिया में और इसी का परिणाम होता है कि उन्हें गिरफ्तारी जैसी कानूनी कार्रवाई गुजारना पड़ता है।
 
 
कान्हा नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर संजय शुक्ला का कहना है, "हम बार-बार आदिवासियों को समझाने के प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन यदि आदिवासी कोर एरिया में पकड़े जाते हैं तो हम वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत कार्रवाई करने के लिए बाध्य हैं जिसकी ज़मानत अदालत से ही हो सकती है।"
 
 
निगरानी में कमी
वाइल्ड लाइफ ऐक्टिविस्ट नवनीत माहेश्वरी का कहना है, "वन विभाग और आदिवासियों के बीच संवादहीनता के कारण ऐसी मुश्किलें आती हैं। वन विभाग को इन अनपढ़ आदिवासियों के साथ निस्संदेह सहानुभूतिपूर्वक रवैया रखना चाहिए।
 
 
बैगा आदिवासी महिलाओं हिरमा बाई और सुखवंती बाई को जब बैहर के जंगल कोर्ट में प्रस्तुत किया गया तो मजिस्ट्रेट ने भी वन विभाग को हिदायत दी कि इस तरह के केस दर्ज करने से पहले आपको आदिवासियों को चेतावनी ज़रूर देनी चाहिए।
 
 
एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं, "कहीं ना कहीं वन विभाग की निगरानी में भी कमी रह गई। जिससे ये महिलाएं वन विभाग से नजर बचाकर जंगल कोर एरिया में पहुंच गईं।"
 

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