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चीन में कोविड विरोधी प्रदर्शनों को कैसे ताकतवर बना रहे हैं युवा

Written By BBC Hindi
Updated: मंगलवार, 6 दिसंबर 2022 (08:03 IST)
फ्रांसिस माओ, बीबीसी न्यूज़
ज़ीरो कोविड पॉलिसी के ख़िलाफ़ चीन में जारी प्रदर्शनों में एक नई बात दिख रही है।  बीते सप्ताहांत इन प्रदर्शनों में युवा पीढ़ी के लोग काफी तादाद में दिखे।  इनमें से कई लोग तो ऐसे थे, जो पहली बार किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए।  ये लोग चीन में तीन साल से जारी ज़ीरो कोविड पॉलिसी पूरी तरह हटाने की मांग कर रहे हैं। 
 
शंघाई में ये लोग पहले बेहद शांति से अपना प्रदर्शन कर रहे थे।  ये सभी पश्चिमी शिंजियांग के एक अपार्टमेंट में लगी आग में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए जमा हुए थे।  इन लोगों का मानना है कि सख़्त कोविड नियमों की वजह से ही ये लोग आग लगने पर अपार्टमेंट से बाहर नहीं आ पाए। 
 
इस तरह पुलिस की भारी तैनाती के बीच हाथों में सादे काग़ज़ लिए इन्होंने अपना शोक प्रकट किया, शांति से फूल अर्पित करते हुए अपनी श्रद्धांजलि दी।  तभी अचानक इनके बीच से एक आवाज़ उभरी- आज़ादी! हमें अब आज़ादी चाहिए! ये लॉकडाउन अब खत्म करो!
 
जैसे-जैसै रात गहराती गई, प्रदर्शनकारियों की भीड़ बढ़ी और नारेबाजी भी उग्र होती गई।  रविवार को स्थानीय समय के मुताबिक तड़के तीन बजे ये नारे लगाने लगे- शी जिनपिंग गद्दी छोड़ो, शी जिनपिंग गद्दी छोड़ो!
 
प्रदर्शन में शामिल एक बीस साल के युवा ने बताया कि उसने जैसे ही शोरगुल और नारेबाजी सुनी वो फौरन अपने कमरे से निकल कर भीड़ की तरफ भागा। 
 
बीबीसी से बातचीत में उस युवक ने बताया "मैंने लोगों का ऐसा आक्रोश ऑनलाइन तो बहुत देखा था, लेकिन अपना विरोध जताने के लिए इस तरह लोगों को सड़क पर उतरते हुए नहीं देखा था। "
 
वो युवक अपने साथ वो कैमरा भी लाया था ताक़ि इन प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो वो अपने मन मुताबिक़ बना सके।  युवक ने बताया 'मैं तमाम लोगों को देखता हूं, पुलिसकर्मी, स्टूडेंट्स, बुजुर्ग लोग और यहां तक की विदेशी लोग भी।  सबकी अपनी अपनी राय होती है, लेकिन कम से कम ये लोग अपनी आवाज़ तो उठा रहे थे।  इस तरह की एकजुटता मायने रखती है और मेरी यादगारी के लिए ये काफी अहम घटना है। "
 
'पहले इतना ग़ुस्सा कभी नहीं देखा'
प्रदर्शनकारियों की भीड़ में किनारे खड़ी एक महिला को भी ये सबकुछ रोमांचक लगा।  बीबीसी से बातचीत में उस महिला ने बताया "मैंने अपनी ज़िंदगी में चीन में ऐसा कुछ होते हुए नहीं देखा।  ये सब देखकर राहत महसूस होती है कि आख़िरकार हम लोग एक साथ जमा हो सकते हैं और वो सबकुछ एक साथ बोल सकते हैं जिसे हम लंबे समय से कहना चाहते थे"
 
बीबीसी से बातचीत में उस महिला ने आगे बताया "ज़ीरो कोविड पॉलिसी ने हमारी ज़िदगी के बेहतरीन साल छीन लिए।  हमारी पीढ़ी की आय खत्म हो गई, शिक्षा और परिवहन के मौके चले गए।  एक बार में महीनों तक लॉकडाउन में रहने की वजह से लोग परिवारों से अलग हुए।  हमें अपनी ज़िदगी के ज़रूरी काम या तो टालने पड़े या फिर हमेशा के लिए कैंसिल करने पड़े।  हमें गहरी निराशा, उदासी और यातना के दौर से गुज़रना पड़ा"
 
इस तरह के कई प्रदर्शन पूरे चीन में देखने को मिल रहे हैं।  बीजिंग की मशहूर सिंगुआ यूनिवर्सिटी में भी छात्र ऑनलाइन प्रदर्शनों से प्रेरित होकर जमा हुए। 
 
इनका एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है।  वीडियो में एक लड़की लाउड स्पीकर पर ऊंची आवाज़ में बिना किसी डर के बोल रही है।  इस दौरान उसकी आवाज़ कई बार भर्राती है और वो रोती हुई दिखाई पड़ती है।  लेकिन भीड़ ये कहते हुए उसका हौसला बढ़ाती है- "तुम बोलती रहो, डरो मत!"
 
वीडियो में लड़की आगे बोलती हुई सुनाई देती है- "अगर हम बदनाम होने के डर से अपनी बात नहीं रखेंगे, तो हमारे लोग हमीं से निराश हो जाएंगे और ये बात सिंगुआ यूनिवर्सिटी की छात्र होने के नाते मुझे हमेशा कचोटती रहेगी। "
 
युवाओं का आक्रोश- सहज या अनाड़ी?
चीन में राजनीतिक रंग ले रहे ऐसे प्रदर्शन बीते कई दशकों से नहीं देखे गए गए।  इन्हें देख अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को 1989 के प्रदर्शनों की याद ताज़ा हो जाती है, जब चीन में ज्यादा नागरिक अधिकारों के लिए ऐसे ही स्टूडेंट्स थियानमेन चौक पर जमा हुए थे।  इस उम्र के कई लोगों को लगता है कि युवाओं में प्रदर्शन को लेकर ऐसा जोश इसलिए भी ज्यादा दिख रहा है क्योंकि इन्हें नहीं पता उन प्रदर्शनों का कैसा ख़ूनी अंत हुआ था। 
 
चीन में ह्यूमन राइट्स वॉच के शोधकर्ता यकीयु वांग कहते हैं, "जिस तरह से ये युवा बेख़ौफ़ होकर सड़कों पर उतर रहे हैं और अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं, इनका आक्रोश युवा आदर्शों के साथ ख़ौफ़नाक यादों से निडरता का मिश्रण लगता है। "
 
वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी नज़र में ऐसे प्रदर्शनकारी छात्र अपने देश के क़ायदे क़ानूनों और पूरे सिस्टम से बेपरवाह है। 
 
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के विशेषज्ञ वेन टी सुंग इन स्टूडेंट्स के लिए 'टैक्टिकल सैवी' जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं, यानी ऐसे युवा जो दिखने में सहज विचार के साथ काफी चतुर भी हैं। 
 
बीबीसी से बातचीत में वो आगे बताते हैं, "ये युवा प्रदर्शनकारी चीन में अब तक की सबसे शिक्षित पीढ़ी है।  ये अपनी सीमाएं अच्छी तरह से जानते हैं, फिर भी कोशिश कर रहे हैं उन्हें सोचे समझे बिना तोड़ने की। "
 
शंघाई के प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को हटाने को लेकर नारे जरूर लगाए, लेकिन इसके बाद अमूमन हर रैली में प्रदर्शनकारी ऐसे नारे से बचते नजर आए। 
 
जब उन्हें लगा कि ये ज्यादा राजनीतिक हो रहे हैं।  इन्होंने सादे काग़ज को अपना सिंबल बनाया जो शांतिपूर्ण और गैर-राजनीतिक प्रदर्शनों का प्रतीक माना जाता है।  जब पुलिस ने इन्हें प्रदर्शन से रोकने की कोशिश की तो इन्होंने ज़ीरो कोविड पॉलिसी के खिलाफ नारेबाजी करने की बजाय तंज कसने वाले लहज़े में कहने लगे- "आप कोरोना की टेस्टिंग और बढ़ाइए, प्रतिबंध भी और ज्यादा लगाइए!"
 
बीबीसी से बातचीत में वेन टी सुंग बताते हैं "आप ग़ौर से देखिए तो तो पता चलेगा ये लोग किस तरह से उन सभी आधारों को पहले से ही कवर कर रहे हैं, जिन पर चीनी सरकार इन पर आरोप लगा सकती है। "
 
उदार राष्ट्रवादी
मसलन बीजिंग में प्रदर्शनकारियों की नारेबाजी का ये तरीका, जिसमें वो बार-बार कहते सुने गए- "क्या शिंजियांग अपार्टमेंट में आग की घटना के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ था? क्या विदेशी ताक़तों की वजह से गुईझोउ में बस पलटी? क्या आज की रात हमें एक साथ यहां विदेशी ताक़तें जुटा लाई हैं?"
 
इस नारेबाजी से गुस्साया एक शख्स रोते हुए चीख पड़ा- 'नहीं, बिल्कुल नहीं। "
 
महामारी से पहले चीन के युवा मुख्य तौर पर अपने भविष्य से जुड़ी योजनाओं में जुटे रहते थे। 
 
लेकिन कोविड के दौरान जिस तरह के सख़्त प्रतिबंध लगे और इसकी वजह से अर्थव्यवस्था चौपट हुई, उसने सब बदलकर रख दिया। 
 
बीबीसी से बातचीत में शंघाई के प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो बना रहे युवा ने बताया- "मैं चीन के बाहर कहीं सैर सपाटे के लिए नहीं जा सकता, मैं अपने परिवार से नहीं मिल सकता।  मेरी मां को कैंसर है और वो गुआंझोउ शहर (Guangzhou) में रहती हैं।  मैं उन्हें काफी वक्त से मिलना चाहता हूं।  मैंने उन्हें लंबे वक्त से देखा नहीं, उनके साथ खाना नहीं खाया।  मैं बस उम्मीद कर सकता हूं कि ये लॉकडाउन जल्द से जल्द खत्म हो। "
 
जिस दिन इस युवक ने बीबीसी को आपबीती सुनाई, उस दिन पता चला उस युवक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। 
 
बीबीसी से बातचीत में और ऑनलाइन दिख रहे वीडियोज में ऐसे तमाम प्रदर्शनकारी बताते हैं वो अपने देश की तरक्क़ी चाहते हैं।  ऐसे प्रदर्शनों में चीन का राष्ट्रगान बजाया जाता है।  उमड़ती भीड़ से ये बार-बार अपील की जाती है- 'खड़े हो जाइए, खड़े हो जाइए'।  ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी के सुंग बताते हैं- "ये वो पीढ़ी है जिन्होंने विकसित होते चीन में अपनी आंखें खोली, अपने देश का बचाव करने और अपनी देशभक्ति जाहिर करने का इनका तरीक़ा काफी अलग है'
 
सुंग ऐसे युवाओं को उदार राष्ट्रवादी करार देते हैं।  सुंग के मुताबिक वो अपने देश के सिस्टम में पूरी तरह यक़ीन रखते हैं, मगर चाहते हैं जब ये नाकाम साबित हो, तो इसकी जिम्मेदारी भी तय हो।  वो कहते हैं "जनभावनाएं सरकार से पक्ष से विपक्ष में बहुत तेज़ी से तब्दील होती हैं।  फ़र्क सिर्फ़ इस बात से पड़ता है कि लोगों में अपने प्रदर्शन को वैध और क़ानून सम्मत रखने की सामूहिक इच्छा कितनी है। "
 
सिंगुआ यूनिवर्सिटी के वायरल वीडियो में भी एक वक़ता इस बात पर लगातार ज़ोर दे रहा है कि प्रदर्शन में कोई कानून नहीं तोड़ा जाए।  वो बार कहता सुनाई देता है- 'हमें यहां ऐसा कोई शख्स नहीं चाहिए जो कानून तोड़े। '
 
इसी वीडियो में एक घबराए हुए पुरुष की आवाज़ भी सुनाई देती है, जिसमें वो कहता है- "अगर ये प्रदर्शन हमारे काबू से बाहर हुआ, तो हम इसे खो देंगे।  हमारे पास ऐसे आयोजन का अनुभव नहीं है, लेकिन धीरे धीरे हम इसे कर लेंगे।"

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