कारगिल : जब भारत की सिफ़ारिश पर पाक सैनिक को मिला सर्वोच्च वीरता पुरस्कार

BBC Hindi| Last Updated: शनिवार, 20 जुलाई 2019 (12:48 IST)
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता

ऐसा बहुत कम देखने में आता है कि शत्रु सेना किसी सैनिक की बहादुरी की दाद दे और उसकी सेना को लिखकर कहे कि इस सैनिक की वीरता का सम्मान किया जाना चाहिए। 1999 के युद्ध में ऐसा ही हुआ जब के मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना के कैप्टन कर्नल शेर खां ने इतनी बहादुरी से लड़ाई लड़ी कि भारतीय सेना ने उनका लोहा माना।
उस लड़ाई को कमांड कर रहे ब्रिगेडियर एमएस बाजवा याद करते हैं, "जब ये लड़ाई ख़त्म हुई तो मैं क़ायल था इस अफ़सर का। मैं 71 की लड़ाई भी लड़ चुका हूँ। मैंने कभी पाकिस्तानी अफ़सर को लीड करते नहीं देखा। बाकी सारे पाकिस्तानी कुर्ते पाजामे में थे। अकेला ये ट्रैक सूट पहने हुए था।"
आत्मघाती हमला : हाल ही में कारगिल पर एक किताब 'कारगिल अनटोल्ड स्टोरीज़ फ़्राम द वॉर' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "कैप्टन कर्नल शेर खां नॉर्दर्न लाइट इंफ़ैंट्री के थे।"
"टाइगर हिल पर पांच जगहों पर उन्होंने अपनी चौकियां बना रखी थीं। पहले 8 सिख को उन पर कब्ज़ा करने का काम दिया गया था। लेकिन वो उन पर कब्ज़ा नहीं कर पाए। बाद में जब 18 ग्रेनेडियर्स को भी उनके साथ लगाया गया तो वो एक चौकी पर किसी तरह कब्ज़ा करने में कामयाब हो गए। लेकिन कैप्टन शेर ख़ाँ ने एक जवाबी हमला किया।"

एक बार नाकाम होने पर उन्होंने फिर अपने सैनिकों को 'रिग्रुप' कर दोबारा हमला किया। जो लोग ये 'बैटल' देख रहे थे, वो सब कह रहे थे कि ये 'आत्मघाती' था। वो जानते थे कि ये मिशन कामयाब नहीं हो पाएगा, क्योंकि भारतीय सैनिकों की संख्या उनसे कहीं ज़्यादा थी।
जेब में चिट : ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा कहते हैं, "कैप्टन शेर खां लंबा-चौड़ा शख़्स था। वो बहुत बहादुरी से लड़ा। आख़िर में हमारा एक जवान कृपाल सिंह जो ज़ख्मी पड़ा हुआ था, उसने अचानक उठकर 10 गज़ की दूरी से एक 'बर्स्ट' मारा और शेर खां को गिराने में कामयाब रहा।"

शेर खां का गिरना था कि उनके हमले की धार जाती रही। ब्रिगेडियर बाजवा बताते हैं, "हमने वहां 30 पाकिस्तानियों के शवों को दफ़नाया। लेकिन मैंने सिविलियन पोर्टर्स भेजकर कैप्टन कर्नल शेर खां के शव को नीचे मंगवाया, पहले हमने उसे ब्रिगेड हेडक्वार्टर में रखा।"
जब उनकी बॉडी वापस गई तो उनकी जेब में ब्रिगेडियर बाजवा ने एक चिट रखी जिस पर लिखा था, 'कैप्टन कर्नल शेर खां ऑफ़ 12 एनएलआई हैज़ फ़ॉट वेरी ब्रेवली एंड ही शुड बी गिवेन हिज़ ड्यू।'' यानी कैप्टन शेर खां बहुत बहादुरी से लड़े और उन्हें इसका श्रेय मिलना चाहिए।

कैप्टन कर्नल शेर खां का जन्म उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत के एक गांव नवा किल्ले में हुआ था। उनके दादा ने 1948 के कश्मीर अभियान में भाग लिया था। उन्हें वर्दी पहने हुए सैनिक पसंद थे। उनका जब एक पोता पैदा हुआ तो उन्होंने उसका नाम कर्नल शेर ख़ाँ रखा। उस समय उनको इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि इस नाम की वजह से उनके पोते की ज़िदगी में कई उलझनें आएंगी।
कारगिल पर मशहूर किताब 'विटनेस टू ब्लंडर - कारगिल स्टोरी अनफ़ोल्ड्स' लिखने वाले कर्नल अशफ़ाक हुसैन बताते हैं, "कर्नल, शेर खाँ के नाम का हिस्सा था और वो उसे बहुत गर्व से इस्तेमाल करते थे। कई बार इससे काफ़ी मुश्किलें पैदा हो जाती थीं।"

"जब वो फ़ोन उठा कर कहते थे 'लेफ़्टिनेंट कर्नल शेर स्पीकिंग' तो फ़ोन करने वाला समझता था कि वो कमांडिंग ऑफ़िसर से बात कर रहा है और वो उन्हें 'सर' कहना शुरू कर देता था। तब शेर मुस्कराते कर कहते थे कि वो लेफ़्टिनेंट शेर हैं। मैं अभी आपकी बात कमांडिंग ऑफ़िसर से करवाता हूं।"

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