जेपी नड्डा क्या राज्यों में चल रहे संकट से पार्टी को निकाल पाएंगे?

BBC Hindi| पुनः संशोधित शनिवार, 12 जून 2021 (10:41 IST)
दिलनवाज़ पाशा, बीबीसी संवाददाता
राजनीतिक रूप से भारत के सबसे बड़े कद वाले प्रांत के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिल्ली दौरे और पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात के बाद, एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव की चर्चाओं को बल मिला है।
 
इससे पहले अंदरूनी कलह के बाद पार्टी में मुख्यमंत्री बदल चुकी है। हिमाचल प्रदेश में भी नेतृत्व बदलने की चर्चाएं चली और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को दिल्ली आकर केंद्रीय नेताओं से मुलाक़ात करनी पड़ी। वापस शिमला लौटकर जयराम ठाकुर ने में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं को निराधार बताते हुए दावा किया कि 2022 में चुनाव होने तक वो ही मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे।
 
उधर दक्षिण में पार्टी नेताओं की बयानबाज़ी के बाद मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को बयान देना पड़ा कि यदि पार्टी चाहेगी तो वो पद से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं।
 
2019 लोकसभा चुनावों में रिकार्ड जीत दर्ज कर केंद्र की सत्ता पर दोबारा काबिज़ होने वाली बीजेपी इस समय भारत के 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी सत्ता में है।
 
इन बयानों और घटनाक्रमों से ऐसी अटकलें शुरू हो गई हैं कि बीजेपी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की प्रबंधन क्षमता को लेकर भी चर्चा हो रही है।
 
राजनीतिक विश्लेषक इसे क्षेत्रीय नेताओं की महत्वाकांक्षा और असंतोष से उपजा संकट मान रहे हैं। वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ये एक बड़े राजनीतिक दल में होने वाले स्वभाविक घटनाक्रम हैं।
 
लेकिन इसमें दोराय नहीं कि जनवरी 2020 में बीजेपी की कमान संभालने वाले जेपी नड्डा के कार्यकाल का ये सबसे चुनौतीपूर्ण वक्त है। हिमाचल प्रदेश से आने वाले जेपी नड्डा अपने संगठनात्मक कौशल के दम पर पार्टी में एक के बाद एक सीढ़ियां चढ़ते गए और पार्टी अध्यक्ष के पद तक पहुंचे। पूर्णकालिक पद मिलने से पहले उन्होंने वर्किंग प्रेसीडेंट की भूमिका भी निभाई।
 
हिमाचल प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके जेपी नड्डा को पार्टी में सबसे पहले बड़ी जिम्मेदारी 2019 में दी गई जब उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया। लोकसभा चुनाव में पार्टी को 80 में से 62 सीटें जिताकर नड्डा ने अपनी नेतृत्व क्षमता भी साबित कर दी।
 
पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के देश का गृह मंत्री बनने के बाद जून 2019 में जेपी नड्डा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। फिर जनवरी 2020 में उन्हें पूरी तरह पार्टी की कमान सौंप दी गई। नड्डा के नेतृत्व में पार्टी ने पहला चुनाव राजधानी दिल्ली में लड़ा जिसमें पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।
 
हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भी पार्टी तमाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने का वो कारनामा नहीं कर सकी जिसका वो दावा कर रही थी।
 
वहीं असम में पार्टी फिर से सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही और पुदुचेरी में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में भी वो सफल रही। हालांकि तमिलनाडु और केरल में पार्टी कुछ खास कलाम नहीं दिखा पाई।
 
सबको खुश रखना है सबसे बड़ी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जेपी नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के सभी नेताओं को संतुष्ट रखना है।
 
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी पार्टी में पनप रहे असंतोष की वजह के बारे में बताते हैं, "स्थापना के बाद से बीजेपी पहली बार पावर पॉलिटिक्स की पार्टी बन गई है। इसमें हर व्यक्ति सत्ता में साझेदारी चाहता है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये संभव नहीं है। 50 साल तक बीजेपी संघर्ष की पार्टी थी, सभी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे। जब पार्टी संघर्ष की पार्टी थी तब उसमें झगड़ा नहीं था लेकिन अब जब सत्ता में है तो उसमें हिस्सा लेने का झगड़ा है।"
 
त्रिवेदी कहते हैं, "बीजेपी का दावा है कि इस समय देश में पार्टी के 18 करोड़ कार्यकर्ता हैं। अमित शाह जब बीजेपी के अध्यक्ष बने थे तब बीजेपी में आठ करोड़ कार्यकर्ता थे। सत्ता संघर्ष की बड़ी वजह ये है कि पावर की चाह रखने वालों की संख्या पार्टी में बढ़ गई है और केंद्रीय नेतृत्व चाह कर भी सभी को संतुष्ट नहीं कर सकता है। "
 
जानकार बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य उप-मुख्यमंत्री के पद पर हैं लेकिन वो पार्टी से इससे अधिक चाहते हैं। वहीं कर्नाटक के राज्य पर्यटन मंत्री सीपी योगेश्वर ने मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ असंतोष ज़ाहिर किया था और दिल्ली में केंद्रीय नेताओं से मुलाक़ात की थी। कर्नाटक कैबिनेट में असंतोष की ख़बरें भी दिल्ली तक पहुंची हैं। हिमाचल में भी कई नेताओं ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है।
 
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह भी इस राय से इत्तेफ़ाक रखते हैं। वो कहते हैं, "जब कोई पार्टी या संगठन बड़ा होने लगता है तो लोगों की महत्वाकांक्षा भी बढ़ने लगती है। लोगों को लगता है कि अब पार्टी बढ़ रही है तो हमें भी कुछ मिलना चाहिए। लेकिन विडंबना ये है कि सभी को ना पार्टी में पद मिल सकता है और ना ही संगठन में।"
 
हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब पार्टी को अंदरूनी संकट का सामना करना पड़ा हो। बीजेपी कर्नाटक में येदियुरप्पा, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, मध्य प्रदेश में उमा भारती और गुजरात में शंकर सिंह वाघेला को पार्टी से बाहर निकाल चुकी है। हालांकि बाद में इनमें से कई नेता फिर पार्टी के साथ आ गए थे।
 
विजय त्रिवेदी मानते हैं कि बीजेपी अभी कांग्रेस की तरह ऐसी पार्टी नहीं बन पाई है जिसमें कई स्तर पर सत्ता का बंटवारा हो। आज हाशिए पर खड़ी दिख रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी 50 सालों तक भारत में सत्ता का केंद्र रही है।
 
त्रिवेदी कहते हैं, "कांग्रेस और बीजेपी में एक बड़ा फर्क ये है कि कांग्रेस ने कई स्तरों पर पावर शेयरिंग की थी। लेकिन बीजेपी अभी ऐसा नहीं कर पाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये नियम बनाया है कि नेताओं के रिश्तेदार ओएसडी या दूसरे पदों पर नहीं रहेंगे। इसे लेकर भी पार्टी के कुछ नेताओं में असंतोष है।"
 
"बीजेपी में असंतोष की एक और वजह ये भी है कि पहले बीजेपी ब्राह्मणों, बनियों और ऊंची जाति के लोगों की पार्टी थी और सत्ता भी उन्हीं के पास रहती थी। लेकिन अब पार्टी में दलितों और पिछड़ों को भी जगह दी जा रही है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आने के बाद पार्टी में ओबीसी वर्ग की अहमियत बढ़ी है, ये भी पार्टी के कुछ तबकों में असंतोष की वजह हो सकती है।"
 
क्षेत्रीय क्षत्रपों की चुनौती
हिमाचल प्रदेश में तीन बार विधायक रहे जेपी नड्डा ने साल 2007 के बाद से कोई चुनाव नहीं लड़ा है। 2014 से वो राज्यसभा सदस्य हैं। हाल के सालों में उन्होंने ना कोई बड़ा चुनाव लड़ा है और ना ही जीता है।
 
राजनीतिक विश्लेक मानते हैं कि बीजेपी में कई राज्यों में ऐसे बड़े नेता हैं जो अपने आप को राजनीतिक कद में नड्डा के समकक्ष या उनसे बड़ा मानते हैं।
 
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "जेपी नड्डा उतने शक्तिशाली राष्ट्रीय नेता नहीं हैं कि उनके दम पर वोट माँगे जा सकें। पार्टी में वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, योगी आदित्यनाथ, उमा भारती, गुलाब चंद कटारिया, डॉक्टर हर्ष वर्धन जैसे नेता ऐसे हैं जो अपने आप को पार्टी में नड्डा के मुक़ाबले अधिक पुराना और ताकतवर समझते हैं।"
 
नड्डा पर एक दबाव ये भी है कि उनकी तुलना अमित शाह से की जाती है जिनका पार्टी पर मज़बूत नियंत्रण था।
 
वरिष्ट पत्रकार प्रदीप सिंह को ये तुलना सही नहीं लगती। वो कहते हैं, "जेपी नड्डा की तुलना यदि अमित शाह के कार्यकाल से की जाएगी तो लगेगा कि उतना अच्छा नहीं है, लेकिन जब आप लाल कृष्ण आडवाणी या नितिन गडकरी के कार्यकाल से करेंगे तो आपको लगेगा कि वो बेहतर कर रहे हैं।"
 
वो कहते हैं, "2012 में जब यूपी का चुनाव हुआ था तो निडिन गडकरी पार्टी के अध्यक्ष थे। पार्टी ने उस वक्त अपनी सबसे बुरी हार का सामना किया। जेपी नड्डा कैसा काम कर रहे हैं ये इस पर निर्भर करता है कि आप तुलना किससे कर रहे हैं। मुझे लगता है कि वो अपनी ज़िम्मेदारी सही तरीके से निभा रहे हैं और उनकी तुलना अमित शाह से करना सही नहीं है।"
 
वहीं विजय त्रिवेदी का मानना है कि स्वयं नड्डा भी नहीं चाहेंगे कि उनकी तुलना अमित शाह से की जाए।
 
वो कहते हैं, "नड्डा चाहकर भी ये कोशिश नहीं करेंगे कि उन्हें अमित शाह के समकक्ष या उनके बराबर ताक़तवर माना जाए। अभी वो जिस स्थिति में है ये उनके लिए सबसे अच्छी स्थिति है। नड्डा का स्वभाव भी ऐसा नहीं है कि वो अमित शाह बनना चाहें। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अमित शाह स्वयं कभी नरेंद्र मोदी बनने की कोशिश नहीं करेंगे।"
 
नड्डा भले ही पार्टी के अध्यक्ष हों लेकिन अभी भी पार्टी में सत्ता और ताक़त का केंद्र कहीं और ही है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि बुधवार को पार्टी में शामिल हुए जितिन प्रसाद सबसे पहले अमित शाह से मिलने गए और उन्हीं के साथ उनकी तस्वीरें मीडिया में आईं।
 
विजय त्रिवेदी कहते हैं कि इसकी "एक वजह ये भी है कि पार्टी में बड़े फ़ैसले अभी भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही ले रहे हैं"।
 
हालाँकि, लंबे समय से बीजेपी को कवर कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि नड्डा को प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का पूरा भरोसा हासिल है।
 
महामारी के कारण पैदा हुए संकट का दबाव
 
कोविड महामारी के दौरान बीजेपी शासित राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में बहुत बुरा हाल रहा। इन राज्यों में महामारी से प्रभावित लोगों ने जब स्थानीय नेताओं पर दबाव बनाया तो उन्होंने राज्य और केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठाए। उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने सीएम को पत्र लिखकर कोविड के कुप्रबंधन का मुद्दा उठाया।
 
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं, ''कोविड महामारी के दौरान पार्टी का स्थानीय नेतृत्व लोगों की समस्याओं का दबाव झेल रहा है। जो पार्टी के छोटे नेता हैं वो ज़मीनी हक़ीकत को अच्छी तरह से समझते हैं। सभी को ये भी लगता है कि पार्टी या नेता अगर दबाव में हैं तो अपनी बात मनवाना आसान होता हैं। ऐसे में कई धड़े अपना असंतोष खुलकर ज़ाहिर कर रहे हैं।"
 
हालांकि वो कहते हैं कि "भारत में जो परिस्थिति थी उससे कोई भी सरकार पूरी तरह नहीं निबट पाती।"
 
उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती
अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मेघालय और गोवा में विधानसभा चुनाव होने है। इनमें से पंजाब को छोड़कर सभी राज्यों में बीजेपी सत्ता में है।
 
मगर अभी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बीजेपी में अंदरूनी लड़ाई की चर्चा हो रही है। ऐसे में देश जब कोरोना के संकट से भी उबर रहा है, बीजेपी और जेपी नड्डा के सामने इन राज्यों में सत्ता बचाए रखने की चुनौती होगी।
 
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "पार्टी और नड्डा के लिए ये बड़ी परीक्षा का समय है क्योंकि अब पार्टी बड़ी हो गई है। पार्टी ने कई चुनाव जीते हैं। अब उसे अपने आप से ज़्यादा उम्मीदें हैं। उससे ये उम्मीद की जाती है कि वो हर चुनाव जीत लेगी। लेकिन किसी भी खेल में कामयाबी दर सौ प्रतिशत नहीं होती है।"
 
उत्तर प्रदेश का घटनाक्रम और नेतृत्व संकट
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म है। हालांकि पार्टी ने इन चर्चाओं को नकारा है, लेकिन दिल्ली और लखनऊ में बीजेपी और संघ नेताओं की मुलाक़ातों से ये तो संकेत मिल ही रहे हैं कि यूपी की राजनीति में भीतरखाने बहुत कुछ चल रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी यूपी में अभी भी अंदरूनी संकट में फंसी है?
 
जानकारों का मानना है कि यूपी का घटनाक्रम अभी पूरी तरह मैनेज नहीं हुआ है। विजय त्रिवेदी कहते हैं, "पार्टी को जो नुक़सान होना था वो हो चुका है, अब बस उसकी भरपाई की कोशिश की जा रही है। बीजेपी उत्तर प्रदेश में इस स्थिति में नहीं है कि योगी आदित्यनाथ को तुरंत सीएम पद से हटा दे।"
 
"मुझे लगता है कि पार्टी में मंत्रणा इस बात पर चल रही होगी कि उन्हें हटाने से कितना नुकसान होगा और उन्हें बनाए रखने से कितना। मुझे ये भी लगता है कि पार्टी ने ये महसूस किया है कि योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए रखने में कम नुक़सान है।"
 
उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं और समझा जाता है कि दिल्ली तक पहुँचने के लिए यूपी में आगे रहना ज़रूरी होता है। ऐसे में बीजेपी उत्तर प्रदेश में किसी भी तरह का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहेगी।
 
हालाँकि, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का मानना है कि यूपी में फिलहाल कोई राजनीतिक संकट नहीं हैं, जो चर्चाएं चल रही हैं वो बस एक राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है जिसके तहत यूपी में योगी आदित्यनाथ को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
 
बीजेपी पर नज़र रखने वाले जानकार कहते हैं कि बीजेपी का पूरा ध्यान कोविड महामारी के बाद ख़राब हुई उसकी छवि को ठीक करने पर है।
 
जानकार मानते हैं पार्टी की रणनीति है कि कोविड के अलावा और मुद्दों को चर्चा में लाया जाए। ऐसा लग रहा है कि पार्टी ने कहीं हद तक इसमें कामयाबी हासिल कर ली है और लोग अब कोविड पर नहीं बल्कि दूसरे मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।'

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